अनेकों लोगों को ईश्वर भक्ति में लगाने बाले, अनेकों को जीवन का ध्येय बताने बाले, अनेकों संसार प्रेमियों को ईश्वर के प्रेम की तरफ घुमाने बाले, भगवान श्री कृष्ण के परम भक्त स्वामी बल्लभाचार्य की कीर्ति चहुंओर फैल रही थी। सचमुच बड़े विलक्षण व्यक्ति थे। किसी भी संसारी को ईश्वर की तरफ मोड़ सकते थे। फिर वह तो संसार में रहकर भी वैरागी था। यह दूसरी बात थी कि अभी उसे ईश्वर भक्ति में आनंद नहीं आया था। निश्चित ही जब स्वामी बल्लभाचार्य उसे अपना शिष्य बना लेंगें, जब वह हरि भक्तों की संगति में रहेगा, जब वह राधा कृष्ण के प्रेमियों का साथ पायेगा तब वह भी उसी भक्ति में डूब जायेगा। फिर उसका संसार बंधन को पार कर लेना निश्चित ही है ।
कह सकते हैं कि उसे कुछ अहंकार भी हो चुका था। आसपास उससे बड़ा वैरागी कोई और न था। सभी परिस्थितियों में वह निर्विकार रहने का प्रयास करता। लोगों के मुख से बार बार अपने वैराग्य की प्रशंसा सुनते सुनते मन कब अहंकार की गर्त में डूबने लगा, उसे पता ही नहीं चला।
फिर भी वह साधक था। अपनी कमियों को जानता था। अहंकार भले ही न पहचान पाया। पर पहचान गया था कि शायद वह सही तरह से ईश्वर भक्ति नहीं कर पाता है। जब वह राधा कृष्ण की भक्ति करने बैठता है, उसका मन उसी तरह से सूखा रहता है जैसे कि संसार के अन्य प्रपंचों से उसने मन को सुखा दिया है। भक्ति की धारा मन में बहती न दिखती।
आखिर एक दिन वह चल दिया। आज वह खुद को बल्लभाचार्य जी का शिष्य बनाने जा रहा था। जिनके सानिध्य में सूर और कुंभनदास जैसे भक्त अपनी भक्ति का प्रकाश बखेर रहे थे।
” संसार में किसी से कभी प्रेम किया है।” स्वामी जी ने स्पष्ट प्रश्न किया।
वह सोचता रहा।
” याद कीजिये। पत्नी, पुत्र, भाई, बहन, माता, पिता मित्र वास्तव में प्रेम के अनेकों रूप होते हैं। किसी न किसी से तो आपको प्रेम होगा ही।”
स्वामी जी ने एक बार फिर विस्तार से बताया। काफी ध्यान देने के बाद भी उसे ऐसा कोई संबंध नजर नहीं आया। वास्तव में इसे तो वह अपनी साधना की श्रेष्ठता ही समझता था।
” मैं समझ गया। आप मेरे मन के वैराग्य को जानना चाहते हैं। सत्य है कि इस संसार का कोई भी संबंध मेरे मन को बांधने में असमर्थ रहा है। सत्य ही है कि मुझे किसी से नाशवान से प्रेम नहीं है। सत्य ही है कि मैं ईश्वर भक्ति के पूर्ण योग्य हूं। सत्य है कि मैं आपका शिष्य बनने की पूरी योग्यता रखता हूं। “
इस बार वह कम बोला। उसका अहंकार अधिक बोल गया। फिर वह शांत होकर स्वामी जी के उत्तर की प्रतीक्षा करने लगा। स्वामी जी कुछ क्षण शांत रहे। फिर उनकी रहस्यमई वाणी से सत्य ज्ञात हुआ।
” अभी आपको वापस जाना होगा। उसी संसार में जाना होगा। अभी आपको प्रेम करना सीखना होगा। मन को आपको प्रेम से भरना होगा। मैं सूखे हृदय में भक्ति की धारा कैसे भर सकता हूं। जिसे प्रेम करना नहीं आता, उसका मन कृष्ण के प्रेम से कैसे भर सकता हूं। नहीं। मैं प्रेम करना नहीं सिखा सकता। प्रेम करना तो खुद सीखना होगा। वहीं नाशवान संसार में। मैं तो उसी प्रेम को कृष्ण के प्रेम से बदलना जानता हूं। पुत्र से प्रेम करने बाले को बता सकता हूं कि कृष्ण तुम्हारे पुत्र हैं। उसी भांति इनसे प्रेम करो। पिता से प्रेम करने बाले का पिता कृष्ण को बना सकता हूं। पति या पत्नी से प्रेम करने बाले का प्रेम भी ईश्वर की तरफ घुमा सकता हूं। पर जिसे प्रेम करना नहीं आता, उसे तो प्रेम करना नहीं सिखा सकता। भक्ति के लिये प्रेम अनिवार्य है। तथा प्रेम के लिये संसार। निश्चित ही वैराग्य का पथ इसी प्रेम से आरंभ होता है और प्रेम पर ही पूर्ण होता है। “
लगता है कि वैराग्य का मार्ग संसार से होकर ही गुजरता है। संसार में मनुष्य प्रेम करना सीखता है। वही प्रेम उसकी मुक्ति का आधार बनता है।
पुराणों के अवलोकन तथा कुछ कल्पना के प्रयोग द्वारा एक प्राचीन प्रेम कहानी लिखने का प्रयास कर रहा हूं जो कि पूरी तरह सांसारिक प्रेम से आरंभ होकर वैराग्य की उच्च कहानी बनेगी। एक विशुद्ध प्रेमी और प्रेमिका की कहानी जिसमें रहस्य, रोमांच और सपर्पण भी है, पुनर्जन्म की अवधारणा भी है, वही सच्चे प्रेम की कहानी किस तरह वैराग्य की कहानी बन जाती है।
लगता है कि प्रेम की अवधारणा उससे अधिक व्यापक है जितनी समझी जाती है। लगता है कि प्रेम वही है जो कि ऊपर उठाता जाये। लगता है कि प्रेम केवल और केवल उत्थान का ही हेतु है।
फिर यदि प्रेम ही पतन का कारण बन जाये तो निश्चित ही वह प्रेम तो नहीं है। प्रेम के रूप में वासना है। जो हमेशा गिराती ही गिराती है। जहाँ प्रेम समर्पण है, वहीं वासना चाहत है। जहाँ प्रेम त्याग है, वहीं वासना प्रभुत्व है। जहाँ प्रेम बलिदान है, वहीं वासना केवल वर्चस्व है। जहाँ प्रेम दाता है, वहीं वासना एक भिखारी ही है।
सत्य तो यही है कि प्रेम और वासना का भेद करना कभी भी आसान नहीं होता। तभी तो अनेकों वासना को ही प्रेम मान पतन की राह पकड़ लेते हैं। फिर न तो खुद प्रसन्न रहते हैं और न ही संसार को कुछ सार्थक दे पाते हैं। वासना के भंवर में पड़े वे प्रेम मार्ग को ही दोष देते रहते हैं। जबकि सत्य तो यही है कि वैराग्य का मार्ग भी प्रेम की कुंजगलियों से ही होकर गुजरता है।
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत ‘प्रशांत’
