पुष्कर माली बहुत देर तक विचारों के सागर में गोता लगाता रहा। अंत में यह तो निश्चित ही था कि उसने भोगों को भोगते भोगते अमरत्व से दूरी बना ली है। वह भोगों को भोगते भोगते आवागमन के चक्र में फसा हुआ है। पर भोगलोक स्वर्ग में देव बना वह किस तरह आवागमन के चक्र से मुक्त हो पायेगा। केवल मर्त्य लोक ही कर्म लोक है। मर्त्य लोक में किये उत्तम फलों को ही तो वह भोग रहा है। इस भोगलोक में रहकर भी क्या वह अपना जीवन संवार सकता है। लगता तो नहीं। फिर भी कुण्डला से पूछने में क्या हानि है।
  ” कुण्डला। लगता है कि एक देव का जीवन ही व्यर्थ है। मानव जीवन ही वह जीवन है जबकि जीव अपने प्रयासों से उच्चता को प्राप्त होता है। वह अपने प्रयासों से सच्चे अमरत्व को भी प्राप्त हो सकता है। जिसमें आवागमन का कोई प्रश्न ही नहीं है।”
  देव के मन में उठ रहे आध्यात्मिक प्रश्नों ने कुण्डला के मन में उसके लिये स्नेह की गांठ को और अधिक मजबूत कर दिया। अनेकों देवों को वह भोगों में बंधते देखती आयी थी। आज उसे ऐसा देव दिखा जो कि भोगों के स्थान पर परमार्थ को अधिक महत्व दे रहा है।
” सत्य ही है देव। निश्चित ही मानव जीवन अधिक श्रेष्ठ है। इसी जीवन में मनुष्य अपने प्रयत्नों से असंभव को भी संभव बना लेता है। अमरत्व वास्तव में देवत्व प्राप्ति तो नहीं। निश्चित ही उस मोक्ष की प्राप्ति है जिसमें जीव अपना अस्तित्व ही ईश्वर में मिला देता है। जैसे जल की बूंद सागर में मिलकर खुद सागर हो जाती है। वैसे मोक्ष के और भी रूप बताये गये हैं। भक्ति मार्ग का अनुसरण करने बाले भक्त अपने आराध्य के नित्य लोकों में उनका सानिध्य पाते हैं। अपने आराध्य की लीलाओं में उनका साथ देने लगते हैं। अनेकों बार जब भक्त रंजन की कामना से आराध्य धरती पर अवतार लेते हैं, उस समय भी उनकी लीलाओं में साथ देने आते हैं। पर वह आवागमन तो नहीं।
  देव। यह सत्य है कि स्वर्ग भोगलोक ही है। पर भोगों में लिप्त रहना तो कभी समझदारी नहीं। भले ही कर्म का फल न मिले। पर हमेशा सुकर्मों में लिप्त रहना ही उचित है। उच्चता पद की नहीं अपितु मन की होती है। उच्च मन बाला प्राणी खुद को हमेशा परोपकार में लगाये रखता है। लोकोपकार के लिये अपने प्राण भी अर्पित करने को तैयार रहता है। बिना फल की इच्छा से किये कर्म फलीभूत होते ही हैं। पता नहीं कि कौन सा कर्म जीव को आवागमन के चक्र से मुक्त दे। “
  पुष्कर माली को कुण्डला ने नयी राह दी। भोगलोक में भी परोपकार में जीवन जीना संभवतः उसे सच्चा अमरत्व प्रदान कर दे। वैसे भी परोपकार में जीना निश्चित भोगों से श्रेष्ठ ही है। यदि भोगलोक में किये कर्मों का फल न भी मिले, उस समय भी भोगों में रमकर अपने मानस को दूषित करने की अपेक्षा परोपकार में रत रहना ही श्रेष्ठ है। पर इस नवीन राह पर वह किस तरह चल पायेगा। अभी भी उसे एक बड़ी समस्या नजर आ रही थी।
  ” कुण्डला। मानव जीवन के सुकर्मों के आधार पर मैं इतना तो जानता हूं कि पुरुष का कोई भी मनोरथ स्त्री के बिना अधूरा है। देवलोक में भी मुझे इस नवीन राह पर चलने के लिये एक स्त्री के साथ की आवश्यकता है। ऐसी स्त्री जो खुद भोगों से परे रहकर मुझ पुरुष को सही राह दिखा सके। देवी। मैं खुद को भोगों से मुक्त कर परोपकार की राह पर चलना चाहता हूं। क्या इस राह पर आप मेरा साथ देंगीं। “
  बातों ही बातों में पुष्कर माली ने अपने प्रेम का निवेदन कर दिया। कुण्डला भी संकोच के कारण नीचे देखने लगी। उसकी आंखे व्यक्त कर रही थीं कि उसे पुष्कर माली का प्रेम स्वीकार है। इस लोक में उसे पुष्कर माली की संगिनी बनना स्वीकार है।
  वैसे देव लोक में कन्याएं खुद अपना वर चुनती रही हैं। पर कुण्डला ने पुष्कर माली को उसके पिता से बात करने की सलाह दी। विन्ध्यवा को भी इस संबंध से कोई आपत्ति न थी। आखिर कुण्डला पुष्कर माली से विधिवत विवाह कर उसकी धर्म संगिनी बन स्वर्ग लोक में उसके आवास पर आ गयी।
  भोगों को ही अपना ध्येय समझते रहे स्वर्ग लोक में पुष्कर माली का आवास साधना का केंद्र बन गया। देव दंपत्ति भक्ति और परोपकार से अपना जीवन संवारने लगे। विभिन्न देवों को मिल रहे भोगों के आनंद की तुलना में उनका आध्यात्मिक आनंद श्रेष्ठ था।
  स्वर्ग की सभा ने कुण्डला और पुष्कर माली दोनों ने दूरी बना ली। हालांकि कुण्डला अभी भी अपने आवास पर संगीत का अभ्यास करती थी, पर अब उसके संगीत में भौतिकता बिलकुल न थी। संसार की असारता को समझ कुण्डला के गीत भक्ति की धारा का प्रतिनिधित्व करने लगे।
  खरबूजे को देख खरबूजा भी रंग बदलने लगता है। संभव है कि दूसरे भी कुछ देव भोगों की एकरूपता से वैराग्य की श्रेष्ठता समझते हों पर खुद निर्णय लेने में असमर्थ रहे हों। पुष्कर माली और कुण्डला द्वारा स्वर्ग में भी वैराग्य पथ का अनुसरण निश्चित ही कुछ देवों को तो आध्यात्मिक मार्ग प्रदान करने ही लगा। खासकर जो देव मानव जीवन में परम वैरागी थे, वे तो एक बार फिर से वैराग्य के पथ पर बढ लिये और आध्यात्मिक सुख को प्राप्त करने लगे।
क्रमशः अगले भाग में 
दिवा शंकर सारस्वत ‘प्रशांत’
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