इतिहास खुद को बार बार दुहराता है। बार बार एक जैसी स्थितियां बनती हैं। बहुधा इन एक जैसी घटनाओं पर बहुत अधिक ध्यान नहीं दिया जाता है। पर जब उस अजीब सी घटना का केंद्र कोई ऐसा हो, जिसकी कुछ विशेष प्रतिष्ठा हो तब साधारण और विशेष मनुष्य भी विशेष रूप से प्रतिष्ठित उस व्यक्ति के आचरण का आधार तलाशने लगते हैं। यह अलग बात है कि विशेष के आचरण का आधार भी कुछ ऐसा विशेष होता है जिसे समझ पाना कभी आसान नहीं होता।
राजकुमार विक्रांत को जन्म दे तथा शिशु अवस्था में ही लोरियों के माध्यम से वैराग्य की शिक्षा देने के बाद रानी मदालसा दो बार फिर से गर्भवती हुईं। दोनों ही बार राजकुमारों का नामकरण संस्कार दरवारियों और प्रबुद्ध जनों के सामने महाराज ऋतुध्वज ने किया। दूसरे राजकुमार का नाम सुबाहु और तीसरे का नाम शत्रुमर्दन रखा गया। दोनों ही बार राजकुमारों के नामकरण के अवसर पर मदालसा अपनी हसी को रोक नहीं पायीं। पति भक्ति के साथ साथ परम विदुषी के रूप में ख्यात मदालसा की अकारण हसी चर्चा से अधिक शोध का विषय बन गयी। सचमुच महारानी के इस तरह हसने के पीछे कोई तो विशेष कारण है।
बड़े राजकुमार विक्रांत की तरह ये दोनों राजकुमार भी उसी लोरी को सुन निद्रा लेते। शिशु काल में ही वैराग्य की शिक्षा पा गये। फिर ये दोनों राजकुमार भी संसार के विषय में एकदम निस्पृह हो गये। बड़े से बड़े ज्ञान को मन में रखे तीनों राजकुमार विक्रांत, सुबाहु और शत्रुमर्दन अपने नाम के विपरीत आचरण करने बाले बन गये। तीन राजकुमारों के होने के बाद भी राज्य को उस राजकुमार की लालसा थी जो भविष्य में देश की शासन व्यवस्था सम्हाल सकें।
तीनों राजकुमारों के विशिष्ट आचरण का कारण निःसंदेह महारानी मदालसा थीं। यह तथ्य महाराज ऋतुध्वज समझ रहे थे। साथ ही साथ हर बार नामकरण संस्कार के समय महारानी मदालसा के हास्य को भी वह विशिष्ट समझ रहे थे। जिसका कारण वह प्रयास कर भी नहीं समझ पा रहे थे।
मदालसा एक बार फिर से गर्भवती हुईं। उन्होंने चौथे राजकुमार को जन्म दिया। लग रहा था कि इतिहास एक बार फिर से खुद को दुहरायेगा। पर इस बार ऐसा नहीं हुआ। महाराज ने इतिहास को बदल दिया। इस बार कुछ ऐसा हो गया कि महारानी मदालसा के हास्य के स्थान पर महाराज ऋतुध्वज की हसी राजकुमार के नामकरण संस्कार के अवसर पर गूंज रही थी।
नामकरण के अवसर पर महाराज ने राजकुमार का नाम नहीं रखा। अपितु उन्होंने महारानी से नाम रखने को कहा। वैसे भी उन्हें महाराज के रखे नाम पसंद नहीं आते थे। तीनों राजकुमारों के नामकरण के अवसर पर महारानी मदालसा हंसी थी। पर महारानी मदालसा ने चौथे राजकुमार का जो नामकरण किया, उसे सुन महाराज खुद को हसने से रोक न पाये। भला अलर्क किस तरह का नाम है। इसका क्या अर्थ है। किस गुण का प्रतीक है। फिर महारानी द्वारा राजकुमार का नाम अलर्क रखने पर किसी को भी हंसी आ सकती है।
महाराज बहुत देर तक हंसते रहे। फिर रुके।
” यह क्या नाम रखा महारानी। अलर्क का क्या अर्थ है।”
” कुछ भी नहीं। वास्तव में किसी भी नाम का जीव के गुणों से क्या संबंध। संसार से निस्पृह रहता जीव जो कि ईश्वर का ही अंश है, किस तरह विक्रांत हो सकता है। फिर शरीर तो जीव का कोई विषय ही नहीं। फिर शरीर रहित का नाम सुबाहु। यह हास्य का ही तो विषय है। तथा सबसे अधिक हंसी का कारण गुणातीत जीव को शत्रु और मित्र के बंधनों से बांधना। शत्रुरहित जीव किस तरह शत्रुमर्दन हो सकता है।
सत्य बात तो यही है कि नाम न तो जीव के गुणों को परिभाषित करते हैं और न ही किसी व्यक्ति के चरित्र को। सत्य तो यह है कि नाम केवल एक पहचान होता है जो कि किसी जीव की इस संसार यात्रा के लिये आवश्यक होता है। फिर अलर्क नाम भी मात्र एक पहचान है। “
” महारानी मदालसा सत्य कह रही हैं। सचमुच जीव गुणातीत होता है। जन्म और मृत्यु के बंधनों से परे होता है। ईश्वर का स्वरूप होता है। तथा संसार का कोई भी नाम किसी जीव को परिभाषित नहीं कर सकते। “
सभा में उपस्थित विद्वानों ने महारानी मदालसा का समर्थन किया। नभ मंडल में प्रगट होकर सप्तर्षियों ने महारानी मदालसा के ज्ञान को सत्य प्रमाणित किया। तथा दसों दिशाओं ने भी जीव को गुणातीत और नित्य बताया। महाराज सहित सभी दरवारियों तथा प्रजा के सर महारानी मदालसा के सम्मान में झुक गये।
” महारानी। आपका कथन सर्वदा सत्य है। नाम केवल जीवन जीने के लिये पहचान होता है। आपकी इच्छा से छोटे राजकुमार अलर्क नाम से जाने जायेंगें। महारानी। आपसे एक अनुरोध है ।मैं ज्ञान में आपकी बराबरी नहीं कर सकता। फिर भी इतना जानता हूं कि एक राजा का चिंतन कभी भी आत्मकेंद्रित नहीं होना चाहिये। राजा केवल प्रजा के हित के लिये जीता है और प्रजा के लिये अपने प्राण भी दाव पर लगा देता है। राजा का तो खुद का कोई व्यक्तिगत जीवन भी नहीं होता। महारानी। मेरा अनुरोध भले ही स्वार्थ से प्रेरित लगे पर वास्तव में स्वार्थ से परे है। महारानी। आपकी शिक्षा के प्रभाव से हमारे तीन बड़े पुत्र संसार से निर्लिप्त हो रहे हैं। हमारी प्रजा की आशा अब छोटे पुत्र अलर्क पर केंद्रित है। राजा और रानी होने के नाते हम केवल अपने पुत्रों के आध्यात्मिक उद्धार तक ही नहीं सोच सकते। सही बात तो यही है कि हमारी प्रजा भविष्य के राजा के लिये चिंतित है। तथा हमारी प्रजा का भविष्य केवल आपके हाथ में है। “
वचन भले ही महाराज ऋतुध्वज ने कहे। पर प्रजाजनों का महारानी के समक्ष हाथ जोड़ना यही सिद्ध कर रहा था कि यह प्रजा का अनुरोध है। सचमुच राजधर्म बहुत कठिन है। कहाॅ मदालसा अपने सभी पुत्रों को वैराग्य की शिक्षा देकर उन्हें आवागमन के चक्र से मुक्त करना चाह रही थी। वहीं अब उसे एक रानी का धर्म पुकार रहा था। एक रानी कभी भी इतनी स्वार्थी नहीं हो सकती कि वह अपने पुत्रों के कल्याण के लिये प्रजा के कल्याण को दाव पर लगा दे। महारानी मदालसा ने सर झुकाकर महाराज और प्रजा का अनुरोध स्वीकार कर लिया। लोरी के स्वर बदल गये। बड़े राजकुमारों को लोरी सुनाकर ही जीवन की असारता, जीव का स्वरूप तथा जीव का अंतिम लक्ष्य का पाठ सिखाने बाली मदालसा छोटे पुत्र को लोरी के माध्यम से ही कर्मयोग का पाठ सिखाने लगीं।
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत ‘प्रशांत’
