बहुत देर बाद जब विप्र माता के चरणों से उठा तो माता का नवीन रूप देख चकित रह गया। माता ने सभी हाथों से हथियार हटा दिये थे। सिंह वाहन माता से कुछ दूर अलग बैठा था। माता अपने सारे आठों हाथों को जोड़ प्रणाम की मुद्रा में थीं। समझ नहीं आ रहा था कि इसका क्या अर्थ है। भक्त निश्चित ही भगवान को हाथ जोड़ प्रणाम करते हैं। पर क्या भगवान उसी तरह भक्त को प्रणाम करते हैं। यह क्या आश्चर्य है।
   विप्र अपने गांव का व्यवहार जानता था। अनेकों बार याचक की याचना पूर्ण करने की असमर्थता मनुष्य दोनों हाथ जोड़ शालीनता से व्यक्त कर देता है। बचपन से ही हाथ जोड़ने का यह अर्थ भी समझता आया विप्र वेदना के सागर में डुबकी लेने लगा। निश्चित ही माता ने मेरी प्रार्थना अस्वीकार कर दी है। बहुत वर्षों के तप के बाद भी मुझे पुत्री की प्राप्ति नहीं हो रही है। यदि भाग्य में निःसंतानता लिखी है तो फिर देव भी सहायता नहीं कर पाते।
   मन में धैर्य रखना होगा। ब्राह्मणी को किस तरह समझाना है, यही मुख्य विचार का विषय है। यदि उसे सीधे सीधे कह दूंगा तो संभव है कि उसके मन में माता आदिशक्ति के प्रति श्रद्धा ही न रहे। फिर कुछ उपाय करना होगा।
  ठीक है। समझ गया। ब्राह्मणी को कुछ इस तरह कहना होगा कि माता देवी प्रसन्न हुईं। पर सत्य बात थी कि हमारे सोच विचार का स्तर ही छोटा था। अब गांव की सारी बेटियां हमारी बेटी होंगी। आज से कन्या गुरुकुल की स्थापना कर बेटियों को शिक्षित बनाने का प्रण लेकर जीवन जीना होगा। केवल खुद से ऊपर सोचने की आवश्यकता है।
  संभव है कि ब्राह्मणी मुझे बीच पथ से वापस हुआ समझ ले। संभव है कि ब्राह्मणी मुझे उद्यमहीनता का प्रतीक मानने लगे। जब देव ही निष्ठुर हों तो फिर कुछ भी संभव है।
   परिणाम की असफलता के कल्पित चित्र को स्मरण कर विप्र की आंखों से आंसू आने लगे। सत्य है कि किसी भी मनुष्य के जीवन में बेटी की बहुत भूमिका होती है। बेटी कभी भी पिता की आंखों में आंसू नहीं देख पाती।
  ” यह क्या पिता जी। आप रो रहे हैं। पिता की आंखों में आंसू देख बेटी की आंखें भी गीली हो जाती हैं। इसीलिये तो पिता बेटी की विदाई के अवसर पर यत्नपूर्वक अपने आंसुओं को रोके रखता है।”
  जैसे सचमुच एक बेटी अपने पिता के आंसू पोंछ रही हो। सब कुछ स्वप्न के समान था। शायद इतनी बड़ी इच्छा भी विप्र की न थी। सत्य को स्वीकार कर पाना असंभव सा लगा।
  माता आदिशक्ति तपस्वी के बहुत पास आ गयीं। एक बार माता के स्वर फिर से वातावरण में गुंजने लगे।
” सत्य तो यही है कि केवल भक्तों को ही आशीर्वाद की आवश्यकता नहीं होती है। अपितु भगवान भी आशीर्वाद के बिना असहाय होते हैं। आशीर्वाद निश्चित ही एक आंतरिक शक्ति और प्रेरणा का काम करते हैं।
   बहुत समय से संसार में स्त्रियों को कमजोर समझा जा रहा है। बहुत समय से बेटियां विश्व में उपेक्षित हो रही हैं। वर्तमान की आवश्यकता है कि बेटियां अपनी शक्ति को पहचानें। मैं खुद संसार में जन्म लेकर नारियों को आत्मनिर्भरता का पाठ पढाना चाहती थी। बेटियों के प्रति उदार मन के दंपत्ति को तलाश रही थी। जिनकी बेटी बन मैं अपने जीवन का उद्देश्य पूर्ण कर सकूं।
   आज आपकी साधना ही पूर्ण नहीं हुई अपितु मेरी वह तलाश भी पूर्ण हुई है। आपकी और मेरी कामना एक दूसरे की पूरक है। आज मैं हाथ जोड़ अपने मनुष्य जीवन के भावी पिता से आशीर्वाद चाहती हूं कि मैं अपने जीवन के उद्देश्यों में सफल रहूं।”
  तपस्वी के मुख से कोई शव्द न निकल पाया। मरुभूमि में प्यास से जिसके प्राण निकल रहे हों, अचानक वह देवी गंगा की कृपा पा जाये तब उस व्यक्ति की जो दशा होगी, वही अवस्था उस तपस्वी की थी। कहाॅ वह अपनी निःसंतानता मिटाने के लिये एक बेटी की कामना लिये माता आदिशक्ति की आराधना कर रहा था, और कहाॅ खुद माता आदिशक्ति उसकी बेटी बनने बाली हैं। अपने जीवन के उद्देश्यों की सफलता के लिये अपने भावी पिता से आशीर्वाद की कामना कर रही हैं।
  तपस्वी को प्रकृतिस्थ होने में कुछ समय लगा। फिर पितृधर्म को पूर्ण करने के लिये तपस्वी के हाथ खुद व खुद आशीर्वाद की मुद्रा में आ गये।
  एक तरफ देवी आदिशक्ति जिनके समक्ष सारे देव हाथ जोड़ खड़े रहते हैं, तपस्वी को प्रणाम कर आशीर्वाद मांग रही थीं। वहीं एक तपस्वी अपनी आराध्या को आशीर्वाद दे रहा था। वहीं दसों दिशाओं में उस तपस्वी के भाग्य की सराहना का गान हो रहा था।
   देवलोक में भी चहल पहल होने लगी। माता आदिशक्ति धरती पर जन्म लेंगी। माता निश्चित ही संसार के दुखों को दूर करेंगी। स्वर्ग लोक में आनंद के गीत गाये जाने लगे।
  कुछ देवांगनाएं वार्तालाप में मग्न थीं।
  ” सुन। जब माता आदिशक्ति धरती पर जन्म लेंगीं, उनका नाम क्या होगा।”
  स्त्रियों की चर्चा में अक्सर आभूषण, वस्त्र के साथ साथ भावी आयोजन की चर्चा भी होती हैं। प्रायः छोटी छोटी चर्चा में गहरी बात खोज लेती हैं।
  दूसरी देवांगना कुछ समय सोचने लगी। माता के अनंत नामों के अतिरिक्त एक अन्य नामकरण आवश्यक लगा।
” अनेकों वर्षों तपस्या कर माता को पुत्री रूप पाने बाले विप्र कात्यायन की पुत्री माता आदिशक्ति का नाम होना चाहिये – कात्यायनी। हाॅ यही उचित है। कात्यायन की पुत्री कात्यायनी। यही नाम तो पिता और पुत्री के परस्पर प्रेम को सबसे अधिक चित्रित करता है। फिर अब अधिक चिंतन नहीं। विश्व में नारियों को शक्ति और सामर्थ्य का पाठ पढाने बाली माता कात्यायनी की जय। “
  चहुंओर माता कात्यायनी की जय जयकार होने लगी। माता के जन्म से पूर्व ही माता का नामकरण हो गया।
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत ‘प्रशांत’
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