कोई भी जीव जब जन्म लेता है तो उसके जन्म के प्रत्यक्ष रूप से दो ही हेतु दिखाई देते हैं। एक उसका पिता और दूसरा उसकी माता। जहाँ जीव को गर्भ में धारण करने बाली तथा फिर उसे जन्म देने बाली माता को बच्चों का अधिक सानिध्य प्राप्त होता है। इसी सानिध्य के कारण बच्चों को माता से अधिक जुड़ाव होता है। माता अपने प्रेम के रस से बच्चों का जीवन सींचती है। माता के प्रेम रस का पान किसी भी बच्चे को जीवन का आधार बनता है।
दूसरी तरफ एक पिता कुछ अधिक कठोर या अनुशासन प्रिय जैसा अपने प्रेम को अपने अंतःकरण में छिपाये रखता है। अक्सर माता के प्रेम के समक्ष पिता का प्रेम कहीं खो जाता है। पर सत्य तो यही है कि जैसे माता के बात्सल्य रूपी प्रेम से बच्चे के जीवन की नींव बनती है। पर उस नींव पर मजबूत इमारत बनाने का कार्य पिता का वह अज्ञात प्रेम करता है।
वैसे अनेकों बार पुरुषों तथा स्त्रियों ने अपनी भूमिका बदली भी है। अनेकों बार बचपन में वाल्सत्य प्रेम से जीवन की नींव रख माता ही उस इमारत की दीवारों को अनुशासन के औजारों से तैयार करती है। तो अनेकों बार पिता भी वाल्सत्य प्रेम से नींव निर्माता बन जाता है।
अक्सर पिता बेटी के जीवन निखारने के कर्त्तव्य से खुद को कुछ दूर ही रखता है। बेटी भावी जीवन की अधिकांश शिक्षा अपनी माता से ही पाती है।
पर सत्य यही है कि एक बेटी के जीवन समर में कुछ अलग कर गुजरने के पीछे उसके पिता का ही अधिक हाथ होता है। जब बेटी खुद को नारीत्व के कुछ प्रचलित मान्यताओं से मुक्त होकर खुद बिना किसी बंधन के आगे बढती है तो निश्चित ही कहा जा सकता है, वह एक उदारमनी पिता की कन्या है। उसे पल पल पर अपने पिता का साथ मिला है।
माना जा सकता है कि एक स्त्री कठिन परिस्थितियों में भी एक पुरुष के अपेक्षा अधिक दृढ होती है। पर क्या एक स्त्री पथ के अवरोधों को देख नहीं घबराती। क्या एक स्त्री खुद को कठोर लक्ष्य के लिये असमर्थ नहीं समझती। शायद ऐसा भी होता है। पर जब वह मार्ग के अवरोधों को पार करने में हताश हो रही हो, उसी समय यदि वह अपने पिता के प्रोत्साहन के स्वर को सुनती है तो अवरोध के रूप में उपस्थित ऊंची से ऊंची पर्वत श्रंखला को सहज ही लांघ लेती है।
माता आदिशक्ति ने देवों को दर्शन दिया। देवों तथा देवांगनाओं द्वारा माता आदिशक्ति को उनके भावी जीवन के पिता कात्यायन के नाम से जोड़ माता कात्यायनी के नाम की जयकार यही प्रमाणित कर रही थीं कि माता के मानव जीवन में कात्यायन कुछ उसी तरह के पिता सिद्ध होंगें जैसा कि जीवन में आगे बढने की इच्छा रखी हर बेटी अपने पिता को चाहती है।
माता के स्नेह भरे नैत्र अनेकों देव और देवियों के समुदाय में किसी को तलाश रहे थे। फिर उस विशाल समुदाय से कुछ दूर, दोनों हाथ जोड़ माता को प्रणाम कर रही कुण्डला की तरफ माता बढ लीं।
” कुण्डला। आपसे सहयोग की आवश्यकता है।”
” आज्ञा करें माता। वैसे भी अब मेरा जीवन अपने स्वामी द्वारा आरंभ किये कार्य को आगे बढाना ही है।”
” अपने गान द्वारा देव लोग में विभिन्न देवियों को उनकी शक्ति से परिचित कराने बाली कुण्डला। अब तुम पृथ्वी लोक की तरफ प्रस्थान करो। निश्चित ही हमारे समक्ष एक बड़ा लक्ष्य है। तुम्हारा गान अनेकों नारियों को जाग्रत करेगा। खुद की सामर्थ्य को भूली अनेकों स्त्रियां एक दिन अन्याय का विरोध करने को तैयार होंगीं। एक दिन स्त्रियां पुरुषों पर अपना बर्चस्व सिद्ध करेंगीं। जाओ कुण्डला। अरे रुको जरा। एक बार वह गान फिर से सुना दो। वह गान जो प्रमाणित करता है कि स्त्रियां कभी अबला नहीं होती। स्त्रियाँ हमेशा सबला होती हैं। हाॅ वह गान…। “
कुण्डला ने माता को नमन किया। वीणा के तारों पर कुण्डला के हाथ चलने लगे। वीणा से निकला संगीत और कुण्डला के कंठ के गान से एक बार फिर देवलोक उस दिव्य गान की रसधार में बहने लगा।
नारी, कब तुम अबला
नारी, तुम हो सबला
रवि रथ पर जो अग्र विराजें
घोर तिमिर लख जिनको भाजे
भानुप्रिया हैं देवी ऊषा
कैसे उनको समझूं अबला
नारी, कब तुम अबला
नारी, तुम हो सबला
यम के पीछे जाने बालीं
मृत्युद्वार से पति लाने बालीं
सत्यवान की भार्या सावित्री
कैसे उनको समझूं अबला
नारी, कब तुम अबला
नारी तुम हो सबला
श्री हरि चरणों से जो जन्मीं
जग के पाप ताप जो हरतीं
सगर सुतों को तारण हारी
कैसे त्रिपथगामिनी अबला
नारी, कब तुम अबला
नारी तुम हो सबला
महत तपस्या करने बालीं
शिव की जो अर्धांगिनी प्यारी
पुत्री शैल और स्कंद मात जो
कैसे हैं वह अबला
नारी, कब तुम अबला
नारी, तुम हो सबला
बृह्मपाप दग्ध पुरंदर
कामी नहुष नहीं प्रतिउत्तर
बुद्धि शक्ति सतीत्व बचाती
कैसे शची हुईं फिर अबला
नारी, कब तुम अबला
नारी, तुम हो सबला
तीन लोक में त्रास बड़ी है
धर्म त्रास, भयभीत घड़ी है
आदिशक्ति का रूप कहाती
नारी तुम हो सबला
नारी, कब तुम अबला
नारी, तुम हो सबला
गान गाते गाते कुण्डला पृथ्वी लोक की तरफ चल दी। उसके सामने एक विशाल लक्ष्य था। अनेकों सुप्त शक्तियों को जगाने का लक्ष्य। भूलोक की प्रत्येक नारी को उसकी शक्तियों से परिचित कराने का लक्ष्य। आखिर यही तो माता के जन्म का उद्देश्य है। भला असुरों के वध के लिये कैसा अवतार। वह तो माता आदिशक्ति की इच्छा से ही संभव है। अवतार का उद्देश्य निश्चित ही बड़ा है। तथा माता के जन्म से पूर्व ही कुण्डला अपना प्रयास आरंभ करेगी।
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत ‘प्रशांत’
