पृथ्वी के अधिकांश हिस्सों में असुरों का आतंक था। असुर जो निश्चित ही किसी जाति, वंश, धर्म, जीव या लिंग का प्रतीक नहीं होते। वास्तव में असुर तो एक मानसिक अवस्था है। जो किसी के भी मानस को विकृत कर सकती है।
   सुख कभी भी धन प्राप्ति नहीं है। सुख तो वास्तव में संतोष का दूसरा रूप है। फिर मेहनती लोग कभी भी अधिक परेशान नहीं होते। पर असुरों के शासन में श्रमजीवी परिवार भी दुखों के भंवर में पड़ गये। दुख तो तब मिटते जबकि श्रम से अर्जित धन लेकर वे घर पहुंच पाते। अनेकों मदिरालय तथा और भी तरह के नशे के कारोबारी असुर उन्हें लुभा लेते। आरंभ में थकान मिटाने का टानिक बताकर आरंभ किया नशा का व्यवसाय अनेकों लोगों के मन को इस तरह विकृत कर चुका था कि अब उन्हें खुद और परिवार के भोजन की चिंता के स्थान पर मदिरा की ही अधिक चिंता थी। नशे में सब लुटा घर की स्त्रियों पर अधिक मर्दानगी दिखा, उन पुरुषों को मदिरा के दुर्गुण ही समझ न आते। 
   इससे भी आगे बढकर व्यभिचार के कारोबारी असुर खुलेआम पुरुषों को बहकाते। फिर खुद की सती स्त्री के स्थान पर लोगों को वे सुंदरियां ही अधिक पसंद आतीं जिनकी यथार्थ कहानी भी किसी को ज्ञात न थी। यह भी सुना जाता कि वे युवतियां भी इन्हीं असुरों के आतंक से मजबूर थीं। 
   कानून की रक्षा के लिये उत्तरदायी सैनिकों के रूप में जब असुर ही नियुक्त होने लगे तो फिर निर्दोष, दोषी बताकर कारागार के कठोर कष्ट भोगने लगे तथा दोषी आजाद घूमने लगे। 
   कभी कभी अपरिहार्य परिस्थितियों में दोषी गिरफ्तार भी किया जाता तो धन बल से आसानी से अपराध मुक्त हो जाता। आखिर निर्णय देने बाले पंच भी तो असुर ही थे। जब न्याय की देवी द्वारा आंखों पर पट्टी बांध लेना निष्पक्षता के स्थान पर अंधत्व का प्रतीक बन जाये तथा न्याय के अधिकारियों के लिये न्याय एक बिक्री की जा सकने बाली वस्तु बन जाये, उस समय न्याय की उम्मीद ही बेमानी है।
   बेटियों का घर से बाहर निकलना बहुत कठिन था। दुराचारी असुरों के मध्य शील की रक्षा करना कब आसान होता है। पर उससे भी अधिक दुखद स्थिति थी जबकि शील और लाशों का भी सौदा माता पिता के रूप में उपस्थित असुर करने लगते। प्रलोभन रूपी अस्त्र से जब विरोध को शांत किया जाता तब लाशों के भी इतने दाम मिल जाते, जो कि पूरे जीवन मेहनत से भी संभव न होता। परिवार में एक व्यक्ति को सरकारी नौकरी दिलाना, अच्छा खासा मुबायजा मिलना, फिर कोई कैसे न डिगे।वैसे भी जीवन आगे बढने का नाम है। दुखद यादें भुलाकर आगे बढने के एवज में यदि अपार संपदा भी मिलने लगे तो आंदोलन केवल मुबायजे के लिये रह जाता है।
   कहीं दहेज रूपी असुरों द्वारा कुलीन बधुओं का उत्पीड़न किया जाता। मौका मिलते ही उन्हें मृत्यु के घाट उतार दिया जाता। कार्यवाही के नाम पर कभी कभी थोड़ी बहुत खानापूर्ति हो जाती।
   दूसरी तरफ कुछ असुर कन्याएं मौजूदा नारी कानूनों को हथियार बना अपने पति और ससुराली जनों का भरपूर उत्पीड़न करतीं। ऐसी चालाक कन्याओं से पीड़ित ससुराली जन न तो समाज से और न कानून से कोई फायदा पाते। सचमुच ऐसे लोगों की तो वह स्थिति थी जो अपनी व्यथा भी किसी को कह न पाते।अपनी बेटियों को भी अर्थ प्राप्ति का आधार बनाने बाले उन असुरों को इस बात का भी पछलावा न होता कि उनके और उनकी बेटी के आचरण से उनकी बेटी का भी गृहस्थ जीवन खराब हुआ है। उल्टा समाज में सफेदपोश माने जाते। 
   अनेकों ऐशोआराम को भोग रहे असुर रूपी धर्म गुरु अपने वाक्चातुर्य से अपने शिष्यों और शिष्याओं की भीड़ इकट्ठा कर लेते। धीरे-धीरे खुद को ही ईश्वर की भांति पुजाने लगते। शिष्यों के धन को तथा मौका मिलते ही शिष्याओं के शील को भी लूटते रहते।
   वैद्य का कार्य करने बाले असुर व्याधि का उपचार करने के स्थान पर पहले व्याधि को बढाते। ताकि मरीजों से अधिक से अधिक अर्थ लाभ किया जा सके। अनेकों गैरजरूरी जांच उनकी चिकित्सा का हिस्सा बन चुका था। बहुत सस्ती औषधियों का बहुत अधिक मूल्य पर बिक्री का अलग ही व्यवसाय बन चुका था। इन सबसे आगे अनेकों बार जीवन रक्षक पद्धतियों में मरीज की मृत्यु के बाद कई दिनों तक रखा जाता ताकि मरीज के परिजनों से अधिक से अधिक अर्थ लाभ ले सकें। अनेकों बार तो ईश्वर का दूसरा रूप चिकित्सक भी शल्य चिकित्सा के दौरान मरीज के शरीर से गुर्दा जैसे अंगों को चुपचाप निकाल लेते थे। इन अंगों का अलग ही व्यवसाय फल फूल रहा था।
   अनेकों गुरुकुलों में गुरु बने असुर विद्या दान के स्थान पर निज आवास पर सायंकालीन सशुल्क कक्षाओं में ही अध्यापन कराते। यद्यपि अध्ययन में कमजोर छात्रों द्वारा अलग से शुल्क लेकर अध्ययन कराना कोई बुरी बात भी नहीं थी। बुरी बात थी कि गुरुकुलों में अतिरिक्त शुल्क के लोभ में असुर गुरों द्वारा बिलकुल भी अध्ययन न कराना। मजबूरी में होनहार छात्र भी इन सशुल्क कक्षाओं में अध्ययन करने के लिये वाध्य थे। गुरुकुल प्रबंधकों के लिये इन स्थितियों का विशेष महत्व न था। वे पहले ही अधिक दर पर पाठ्यपुस्तकों, पुस्तिकाओं, वर्दी आदि का व्यापार कर तथा अभिभावकों से अच्छा खासा शुल्क लेकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर चुके थे।
   जिनपर विकास की जिम्मेदारी थी, ऐसे अनेकों प्रशासनिक अधिकारी जनता के विकास को छोड़ अपना विकास कर रहे थे। जनता के हित के लिये निर्गत अधिकांश सरकारी धन को खुद की और अपने परिवार की मौजमस्ती पर खर्च कर रहे थे। अधिकार और जिम्मेदारी दोनों एक दूसरे के पूरक होते हैं, ऐसे सिद्धांत उन असुर रूपी अधिकारियों की नजर में नगण्य थे। 
   असुर निश्चित ही कोई कल्पना का विषय नहीं है। आज भी धरा पर अनेकों असुर मोजूद हैं। मुख्य है कि अपने मन से असुर भाव को नष्ट करना। हालांकि हमेशा दूसरे के मन के असुरों पर निशाना बनाकर सभी असुर बचे रहते हैं। ऊपर से एक दूसरे का विरोध दिखा वास्तव में सभी एक दूसरे के सहयोगी बने रहते हैं।
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत ‘प्रशांत’
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