शुंभ और निशुंभ के निधन के बाद तथा रक्तबीज जैसे मायावी के अंत के बाद आखिर महिषासुर को ही समर में आना पड़ा। सभी देवों को जीत चुके असुर स्त्रियों की सम्मिलित शक्ति के समक्ष खुद को असहाय महसूस करने लगा। जिन्हें शक्तिहीन समझा था, वे नारियां ही असुरत्व को चुनौती दे रही थीं। कहीं वह भी तो इन नारियों से पराजित तो नहीं हो जायेगा,इस चिंता में महिषासुर का मन शांत नहीं हो पा रहा था। 
   खुद की शक्ति का प्रदर्शन करते हुए महिषासुर एक विशाल महिष पर आरूण हो रणभूमि के लिये निकल पड़ा। सप्तर्षियों के साथ देव इस रण को देखने नभ मंगल पर आ चुके थे। इतिहास में पहली बार वह घटित होने जा रहा कि नारी शक्ति असुरत्व की शक्ति को सीधे सीधे चुनौती देने जा रही थीं। 
  ” पिता जी। आज वह दिन आ चुका है, जिसके लिये मैंने इस धरा पर जन्म लिया था। आज वह दिन है जबकि आपकी बेटी एक महाबली असुर का सामना करने जा रही है। यह आपके शिक्षण का ही प्रभाव है कि आपकी बेटी न केवल खुद अन्याय का प्रतिकार करती रही है, अपितु उसने विश्व में अनेकों स्त्रियों को संगठित कर दिया है। आज के रण में मुझे विजय मिले, यह आशीर्वाद चाहती हूं। “
  कात्यायनी जब अपने पिता कात्यायन के समक्ष सर झुका रही थीं, उस समय कात्यायन का मन अनेकानेक विचारों के झंझावातों से जूझने लगा। कभी अपनी बेटी की क्षमता विचार प्रफुल्लित होता तो कभी रण की अनिश्चितता ध्यान कर दुख के सागर में डूबने लगता। विप्र निश्चय नहीं कर पा रहे थे। 
  आह। क्या बेटी को आत्मनिर्भर बनाने का मेरा निश्चय सही था। आज बेटी उस महाबली असुर का सामना करने जा रही है,जिसने देवों के देव भगवान विष्णु को भी रण में हरा दिया था। आज मन विचलित हो रहा है। इतिहास यही कहता है कि बदलाव की बहार लाने बालों को खोना ही अधिक होता है। आज बेटी कात्यायनी जिस राह पर जा रही है, उसका परिणाम अनिश्चित है। 
  सत्य है कि अब कुछ हो भी नहीं सकता है। सत्य तो यह है कि हम पुरुष ही कमजोर हैं जो इतने समय तक अधर्मियों का अधर्म झेलते रहे। जीवित रहने की चाह में वह गुलामी करते रहे जो कि मृत्यु से भी अधिक कष्टकर थी। 
  कात्यायन निश्चित नहीं कर पा रहे थे। अचानक दिशाओं में एक दिव्य प्रकाश फैल गया। कात्यायनी ने अष्टभुजा रूप रख लिया। विशाल सिंह पर सवार माता कात्यायनी की जय जयकार से नभ और धरती गूंजने लगे। 
  ” पिता जी। आप भूल रहे हैं। आज के दिन के लिये ही मेरा जन्म हुआ है। आप भूल रहे हैं कि आपने मुझे बड़ी तपस्या के उपरांत बेटी के रूप में पाया है। वैसे इसमें आपका दोष भी नहीं है। यही मेरी माया है। सत्य तो यही है कि प्रत्येक मनुष्य ईश्वर का स्वरूप होता है। पर माया के प्रभाव में अपने स्वरूप को भूला रहता है। 
   पिता जी। मैं मानवी हूं या देवी अथवा खुद जगत का निर्माण करने बाले ईश्वर की शक्ति। यह महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण है कि स्त्रियां कभी भी पुरुषों से कम नहीं होतीं। महत्वपूर्ण है कि बेटियां भी खुद के बल पर एक बड़ा बदलाव ला सकती हैं। महत्वपूर्ण है कि स्त्रियां भी धर्म स्थापना में मुख्य भूमिका निभाती हैं। 
   पिता जी। यदि मैं ही आदिशक्ति नाम से पूजित समूचे विश्व की शक्ति हूं तो फिर तो मैं ही इस सृष्टि के निर्माण और अंत की हेतु हुई। फिर कुछ असुरों के वध के लिये मेरा धरती पर जन्म। केवल इतना तो सत्य नहीं है। 
  पिता जी। सत्य है कि नारी सशक्तिकरण के जिन सिद्धांतों को हम मन से मानते रहे हैं, उन्हीं सिद्धांतों की प्रायोगिक सिद्धता ही मेरे जन्म का उद्देश्य है। 
  मैं मानवी हूं या देवी। पर आपकी बेटी हूं । आज के निर्णायक समर में सफलता के लिये आपके आशीर्वाद की आवश्यकता है। “
  फिर माता कात्यायनी ने अपने पिता कात्यायन के समक्ष अपना शीश झुका दिया। आज फिर कात्यायन एक धर्म संकट में थे। सृष्टि की माता आदिशक्ति उनकी बेटी के रूप में थीं। उन्हें माता मान प्रणाम किया जाये अथवा बेटी मान आशीष दिया जाये। 
   विप्र को प्रकृतिस्थ होने में कुछ समय लगा। अनेकों वर्षो पूर्व का दृश्य फिर से सार्थक होने लगा। 
   ” कात्यायनी। निश्चित ही आप माता आदिशक्ति हो। पर सत्य तो यही है कि इतने समय में आपको बेटी समझता रहा मैं आपके किसी अन्य रूप को स्वीकार कर पाने की स्थिति में नहीं हूं। आपका बेटी बाला रूप ही मुझे अभीष्ट है। यदि यह सत्य है कि पिता का आशीर्वाद फलदायी होता है तो मैं अपने जीवन के संचित सुकर्मों को साक्षी बनाकर आशीर्वाद देता हूं कि आज समर में मेरी बेटी कात्यायनी ही विजयी होंगी। 
   यदि यह सत्य है कि आप ही मेरी आराध्या माता आदिशक्ति हैं तो आज मैं आपसे मैं अपनी बेटी कात्यायनी के जीवन की सलामती ही चाहता हूं। माता। सत्य है कि एक पिता का मन बहुत कोमल होता है। वह खुद की बेटी को भी आदिशक्ति के रूप में देख अपनी बेटी की चिंता से मुक्त नहीं हो पाता है। “
   अद्भुत दृश्य था जबकि विप्र कात्यायन अपनी बेटी को सफलता के लिये आशीर्वाद दे रहे थे, वहीं माता आदिशक्ति से कात्यायनी के जीवन की ही भिक्षा मांग रहे थे। 
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत ‘प्रशांत’
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