महाराज ऋतुध्वज ने महारानी मदालसा की आंखों से आंसू पोंछ दिये। इस समय वह बुढापे की तरफ बढ रहे, गिर कर बार बार उठने का प्रयास कर रहे प्रेम कहानी के ऐसे नायक लग रहे थे जो कि जीवन के अंतिम समय तक भी प्रेम के लिये कुछ भी कर सकते थे। पर सत्य यह भी था कि वह वास्तव में दिशाहीन थे। समझ नहीं पा रहे थे कि अपने प्रेम के लिये वह जिस प्राचीन परिपाटी से बच रहे थे, यह उनकी प्रेमिका को कितना पसंद है। 
  ” महारानी। सब नियति का खेल है। सचमुच शोक करने का विषय है। जीव अजर, अमर और स्वतंत्र होने के बाद भी जब संसार बंधन में बंधता है तो फिर चाह कर भी वेदना से दूर नहीं हो पाता। कभी कभी तो वह पीड़ा कुछ ज्यादा ही हो जाती है। जैसे नर और मादा परिंदे अपने बच्चों की देखभाल करते हैं। उन्हें अनंत आकाश में उड़ान भरने की शिक्षा देते हैं। फिर एक दिन वे बच्चे उड़ान भरकर कहीं दूर चले जाते हैं। इसमें इन बच्चों का कोई दोष नहीं। तथा माता और पिता परिंदों का भी नहीं। फिर संभवतः वे भी संतोष करते होंगें कि उनकी शिक्षा सार्थक हुई। “
  महाराज ने परम विदुषी मदालसा को उन्हीं के ज्ञान से शांत करने का प्रयास किया। मदालसा कुछ अलग गहन चिंतन में थीं। 
” सत्य कहा महाराज। पर जब बच्चों को ही आकाश को छूने की शिक्षा देने बाले वे परिंदे ही धरती के प्रेम में नभ को भूलने लगें फिर तो चिंता की बात है।” 
  ऋतुध्वज मदालसा के वचनों का आशय समझने का प्रयास कर रहे थे। प्रयास के बाद भी असफल रहे।
  ” अब नहीं महाराज। यही तो दुख का विषय है कि केवल लोरियों के माध्यम से अपने तीन पुत्रों को जिस राह पर सफलता पूर्वक चलना सिखा दिया, वह राह अभी मुझसे और मेरे पति से दूर है। पर अब दूर नहीं रहेगी स्वामी। यह संसार यों ही आगे बढता रहेगा। कुछ जन्म लेते रहेंगे और कुछ संसार से जाते रहेंगें। स्वामी। अब वह समय आ चुका है कि हम दोनों भी उस मार्ग के राही बनें जिस पर हमारे तीन पुत्र जा चुके हैं। आप अलर्क की चिंता न करें। अलर्क पूरी तरह योग्य नरेश सिद्ध होगा। प्रजा की वह देखभाल कर लेगा। चिंता तो मुझे करनी है कि प्रजा का कल्याण करने के बाद वह खुद का कल्याण किस तरह करेगा। उसको राह कौन दिखायेगा और कैसे दिखायेगा। वैराग्य के मार्ग पर बढने से पूर्व अलर्क के भविष्य की भूमिका भी तो तैयार करनी है। “
  महाराज समझ गये कि वह अभी तक दिशाहीन थे। वे अभी तक अपनी प्रिया के दुख को समझ नहीं पा रहे थे। और सच समझकर फिर वह एक क्षण भी नहीं रुके। एक आकस्मिक बैठक आयोजित कर अलर्क के राजतिलक की घोषणा कर दी। 
   कुछ ही दिनों बाद एक शुभ मुहूर्त में बड़े धूमधाम के साथ राजकुमार अलर्क का राज्याभिषेक कर दिया गया। अभी तक प्रायः महारानी मदालसा ही अलर्क को राजधर्म की शिक्षा देती थीं। आज महाराज ऋतुध्वज ने अलर्क को राजधर्म के बारे में विस्तार से बताया। राजा का जीवन कभी भी सुखों का पर्यायवाची नहीं होता है। राजा हमेशा अपना कर्तव्य पूर्ण करता रहता है। राजा कभी भी खुद के लिये नहीं जीता है। राजा का जीवन और मरण दोनों ही प्रजा के लिये ही होता है। कई बार तो प्रजा का मंगल पूर्ण करने के लिये राजा को वह भी करना होता है जो कि वह कभी करना नहीं चाहता। रण या संधि का फैसला भी राजा अपने आत्मसम्मान से परे होकर प्रजा के कल्याण की कामना से करता है। राजा प्रजा का आदर्श होता है। इसलिये राजा को अपना आचरण इस तरह का रखना चाहिये कि प्रजा उसका सम्मान करती रहे। राजा का न तो दिन होता है और न रात्रि। 
  अलर्क ये सारी शिक्षा पहले ही अपनी माता से प्राप्त कर चुका था। इन शिक्षाओं को अपने जीवन में उतार चुका था। राजकुमार रहते हुए भी वह दिन और रात प्रजा के कल्याण के लिये तत्पर रहता था। वैसे महारानी मदालसा प्रतिदिन उसके कार्यों की समीक्षा करती थीं। उसे सही और गलत का अंतर समझाती थीं। पर आज के बाद उसे ही सारे निर्णय करने होंगें। उसके निर्णयों का आकलन करने के लिये महारानी मदालसा साथ न होंगीं। 
  अलर्क पिता के उपदेशों को गहराई से सुन रहे थे। उन्हें उम्मीद थी पिता जी के बाद माता जी उन्हें कोई गहरी बात बतायेंगी। कोई ऐसी बात जो उसे अभी तक ज्ञात नहीं है। कोई ऐसा तथ्य जिसे पूरी तरह जाने बिना वह अपना कर्तव्य सही तरह निर्वहन नहीं कर पायेगा। पर महाराज के शांत होने के बाद भी मदालसा शांत रही। वास्तव में यह उस तूफान को छिपाने का प्रयास था जिसे अपने मन में रख मदालसा अपने पति का अनुगमन करने बाली थीं। छोटे पुत्र को वैराग्य का मार्ग न दिखा पाने की पीड़ा मदालसा के मन में छिपी थी जिसे वह यत्न पूर्वक बाहर लाने से रोक रहीं थीं। 
  अलर्क ने अपने पिता और माता के चरण स्पर्श किये। उसी समय महारानी मदालसा ने एक पत्र अलर्क के हाथों में रख दिया। 
  ” पुत्र। तुम्हें तुम्हारा कर्तव्य स्मरण कराने की मुझे आवश्यकता नहीं है। यह एक गुप्त पत्र है। इसे अभी मत पढना। जिस दिन किसी विपत्ति से पार पाने में पूरी तरह असफल रह जाओ, जिस दिन तुम्हें ऐसा लगे कि मेरी शिक्षा अपर्याप्त है, जिस दिन तुम अपने पूज्य पिता जी के उपदेशों से भी राह न पा सको, उस दिन यह पत्र तुम्हारी राह बनेगा। “
अलर्क को आशीर्वाद देकर महारानी मदालसा और महाराज ऋतुध्वज उसी निमिषारण्य की तरफ चल दिये जहाँ उन दोनों के मिलन की पृष्ठभूमि रची गयी थी। जहाँ कुण्डला ने तप कर जीवन का अंतिम चरण व्यतीत किया था। दोनों प्रेमी जीवन के इस चरण में साथ साथ उसी तरफ चल दिये जहाँ उन्होंने अपने प्रेम को सार्थक किया था। 
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत ‘प्रशांत’
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