सुबह सुबह गोमती नदी के तट पर विचरण करते तीनों मित्रों ने एक अकेली युवती को नदी तट पर विचरण करते देखा तब तीनों उसी ओर चल दिये। सुजान और कापाली को उस एकाकी कन्या की चिंता हो रही थी। क्या कारण है कि कोई कन्या इतना सुबह यहाँ विचरण कर रही है। नजदीक कोई गांव और बस्ती भी नहीं है। गुरु तुंबुर का आश्रम भले ही निकट है फिर भी यह बहुत कुछ जंगली इलाका है। आबादी से दूर शांति के रंग में डूबा। भले ही राज्य चोर डाकुओं से सुरक्षित है फिर भी वन्य पशुओं का क्या। अक्सर गोमती नदी के इस तट पर सिंह, बाघ और तेंदुए पानी पीते आते रहते हैं। ऐसे भयानक स्थल पर यह सुंदर कन्या किस तरह। किस तरह अपने परिजनों से भटकी हुई इस ओर आ गयी। शायद किसी को सहायता के लिये पुकारने का साहस भी नहीं कर पा रही है।
किसी कन्या को घर से निकाल वन में छोड़ देना, दुष्टों के चंगुल से विधि वश मुक्त हो किसी युवती का वन मार्ग में छिपते छिपते अपने गंतव्य तक जाना, ऐसी स्थितियां इस राज्य में संभव नहीं हैं। पर राजकुमार ऋतुध्वज जानते थे कि धरा पर बहुत कुछ संभव है। भले ही उनके राज्य में अत्याचार संभव नहीं, पर अत्याचार संभव है। संभव है कि किसी सीमावर्ती राज्य की कन्या ऐसे ही किसी अत्याचार से परेशान इस घनघोर वन में अपने प्राण देने के लिये ही आयी हो। फिर तो इसकी रक्षा आवश्यक है। एक क्षत्रिय का, एक राजकुमार का और एक भविष्य के राजा का यही तो कर्तव्य है।
वैसे राजकुमार ऋतुध्वज अपने दोनों मित्रों के सापेक्ष अधिक शक्तिसंपन्न थे। पर आज कन्या के नजदीक पहुंचने की शक्ति में उनके कदम अपने मित्रों की अपेक्षा कम शक्तिशाली सिद्ध हो रहे थे। संभवतः उनका मन किसी अज्ञात संकोच के कारण कदमों को रोक रहा था। वही संकोच जो दो प्रेमियों के प्रेम का आरंभ है। वही संकोच जो दो प्रेमियों को तड़पाता है। मन की बात जुबान पर आने से रोकता रहता है। स्थिति का विश्लेषण करता रहता है।
सुजान और कापाली की तेजी के पीछे का घटक भी प्रेम ही था। पर वह प्रेम कुछ अलग तरह का था। जब कोई भाई अपनी भगिनी को संकट में समझता है, उस समय उसका भात्रप्रेम उसे रुकने नहीं देता। यदि बहन विश्व के दूसरे कौने पर भी मौजूद है, तब भी भाई उसकी रक्षा करने पहुंच ही जाते हैं।
महाराज युधिष्ठिर के राजसूर्य यज्ञ में शिशुपाल वध के अवसर पर श्री कृष्ण के हाथ में सुदर्शन से ही चोट लग गयी। वैसे सुदर्शन उनका नित्य अस्त्र उन्हीं को कैसे चोटिल कर सकता है। लगता है कि आगे की कुछ घटनाओं की पृष्ठभूमि सुदर्शन ने तैयार की थी। द्रुपद नंदिनी महारानी याज्ञसेनी ने श्री कृष्ण की हथेली से गिरते रक्त को देख तुरंत अपनी साड़ी का पल्लू फाड़ श्री कृष्ण की हथेली पर पट्टी बांध दी। बस यों ही कृष्ण ने कृष्णा को अपनी बहन मान लिया।
फिर वह काला दिन भी आया कि पांच शक्तिशाली पतियों की अर्धांगिनी अपनी अस्मत की रक्षा के लिये गिड़गिड़ा रही थी। और बहुत दूर द्वारिका में बैठा उनका भाई रुक न सका। खुद वस्त्रावतार लेकर अपनी बहन के सम्मान का रक्षक बना।
मदालसा अभी तक प्रकृति दर्शन में ही खोयी हुई थी। अचानक मनुष्यों के पदचाप सुन प्रकृतिस्थ हुई। वह अभी जानती न थी कि किनपर विश्वास किया जाये और किनपर नहीं। पहले ही देर तक रुकने की भूल वह कर चुकी थी। मनुष्यों के नजदीक आने से पूर्व वह निकल जाना चाहती थी। पर निकल न पायी। उसके पैर रुक से गये। आखिर नजदीक आ रहे युवक उसे ” बहन रुको। हम आ रहे हैं।” कुछ इसी तरह पुकार रहे थे। सत्य था कि मदालसा सुखों के बीच पली बढी, गंधर्व लोक की राजकुमारी भाई के प्रेम से बंचित ही थी। फिर वह अनजान पर भी कैसे विश्वास न करती। सत्य है कि संबंध कभी भी बन जाते हैं। गंधर्व लोक की राजकुमारी को पृथ्वी लोक में भाई मिलने जा रहे थे।
सुजान और कापाली दोनों ही मदालसा के निकट आ गये। अब मदालसा को भी उन दोनों अनजानों से भय नहीं लग रहा था। भाई पर तो विश्वास करना ही चाहिये।
” बहन। तुम कौन हो। इस निर्जन में किस तरह। आपका गांव किधर है। यह बहुत भयानक इलाका है। सिंह और व्याघ्र की विचरण स्थली।”
” हाॅ भाई ।मैं जानती हूं। पर सिंह और व्याघ्र कोई भय का विषय तो नहीं। मुझे तो अक्सर मिल ही जाते हैं। ईश्वर ने उन्हें आमिषभोजी बनाया है। पर हत्यारा तो नहीं। “
” क्या। आपको भय नहीं लगता। “
” नहीं। भय की क्या बात। प्रकृति के विभिन्न रूपों में क्या भयानक।”
” चलो। फिर ठीक है। तुम्हें तुम्हारे घर तक छोड़ आते हैं। “
अब मदालसा संकोच में पड़ गयी। समझ नहीं पा रही थी कि धरती लोक में भाई बने इन दोनों युवकों को वह सत्य बताये अथवा झूठ बोले। वह तो खुद धरती लोक की कन्या ही नहीं है।
उस समय तक मदालसा के मानस में छिपा प्रेम भी बाहर आ गया। मदालसा को भात्रप्रेम का रूप दिखा रहा था और इंतजार कर रहा था, अपना रूप बढाकर मदालसा के मानस पर छा जाने का। मदालसा को सुध बुध खोने की स्थिति तक ले जाने का। प्रेम तैयार था मदालसा के मानस में राजकुमार ऋतुध्वज की अमिट तस्वीर तैयार करने को। तैयार था एक नवीन प्रेम कथा का आरंभ करने को।
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत ‘प्रशांत’
