अक्सर कुण्डला समय देखकर बाहर आती जाती। शायद वह भी मदालसा के उद्धारक की तलाश में थी। पर सत्य तो यही है कि किसी बंधन में बंधी कन्या के उद्धार के लिये कितने लोग तैयार होते हैं। वैसे भी पातालकेतु का दुर्ग अगम था। पर उससे भी अधिक अगम थी , पुरुषों की रूढिवादी विचारधारा। कोशिश करने पर असंभव कुछ भी नहीं होता है। पर जब मन में किसी कन्या के लिये उचित विचारों की धारा ही नहीं बह रही हो तब कोशिश ही कौन करता है। यदि यही आसान होता तो कितनी ही मजबूर कन्याओं को पतन से बचाया जा सकता है। वास्तव में तो मजबूर कन्याओं की आजादी भी उन्हें जीवन समर की भयानकता का ही अनुभव कराती हैं। सचमुच कितनी ही निरपराध कन्याएं इसी समाज के भय से चुपचाप अपना जीवन इन अंधेरी गलियों में बिता देती हैं।
पातालकेतु की कैद में भी मदालसा पवित्र बनी रही। पर यह प्रश्न कुछ गौण रह गया। वास्तव में एक असुर के चंगुल में फसी कन्या की पवित्रता पर विश्वास ही कौन करता है।
दिन, सप्ताह और महीने व्यतीत हो गये। बीच बीच में पातालकेतु द्वारा मदालसा को प्रलोवन मिलते रहे। वैसे भी वह मदालसा के रूप का आशिक, सचमुच उसके लिये कुछ भी कर सकता था। रंभा का वरिष्ठ स्थान अपना अस्तित्व बचाने को संघर्ष कर रहा था। मदालसा चाहती तो पातालकेतु सहित पूरे असुर राज्य को अपनी अंगुलियों पर नचा सकती थी। पर ऐसा नहीं हुआ। क्योंकि मदालसा का मन उससे भी अधिक महान था जितना कि कोई विचार कर सकता है। एक तरफ अनेकों सुख मदालसा की स्वीकृति की प्रतीक्षा कर रहे थे, वहीं पातालकेतु का मदालसा से बार बार बार अनुरोध रंभा के मन में मदालसा के लिये घोर विरोध को जन्म दे चुका था। विरोध जो सही और गलत के विवेक से परे जाकर केवल और केवल घृणा और वैर को बढाता है। पातालकेतु का प्रणय निवेदन स्वीकार न करने के बाद भी रंभा के मन में मदालसा के लिये सौतिया दाह जन्म ले चुका था। प्रत्यक्ष को अस्वीकार करना कठिन होता है। और प्रत्यक्ष यही था कि एक न एक दिन मदालसा का हठ हार जायेगा। शायद वही दिन रंभा के बर्चस्व का आखरी दिन होगा। मदालसा के मन की गहराइयों का अवलोकन कर पाना असुरभार्या के वश में न था।
कुण्डला के प्रयासों को बार बार असफल होते देख मदालसा वास्तव में विचलित हो गयी। आखिर कोई कब तक धैर्य रखे। वैसे भी जब आजादी के बाद का जीवन भी सामाजिक घृणा भरा ही हो सकता है तो फिर उस जीवन से क्या लाभ। एक बार मन में किसी राजकुमार के लिये प्रेम का राग जन्मा। पर अब वह भी अतीत की गाथा है। एक अपहृता कन्या को कौन निर्दोष मानता है। वास्तव में दोष तो स्त्रियों को ही चुन चुनकर दिये जाते हैं।
मदालसा ने काष्ठ एकत्रित कर अग्नि प्रज्वलित कर ली। निश्चित ही एक स्त्री का जीवन ही कठिनाइयों भरा है। आत्महत्या निश्चित ही पाप है। पर कभी कभी आपदधर्म भी है। आखिर अब इस जीवन का क्या प्रयोजन जिसमें कोई सम्मान ही नहीं। वैसे भी यह शरीर अब जीवित लाश ही तो है। सत्य है कि अहंकार का हमेशा पतन होता है। निश्चित ही यह आपदा उस रूप का परिणाम ही तो है जिसपर न चाहते हुए भी मैं कभी कभी मोहित होती थी। अरे दुख है कि यही रूप मेरी बदहाली का कारण बना। अब किसपर विश्वास किया जाये। उचित है कि यह जीवन ही नष्ट कर दिया जाये।
यद्यपि कुण्डला हमेशा मदालसा को उचित राह बताती रहती थी पर आज वह भी मदालसा के वेदना को कम करने में समर्थ न थी। आखिर अभी तक ऐसी कोई राह दिखाई नहीं दी जिसके अबलंबन से मदालसा की वेदना को कम किया जा सकता है। फिर लगता है कि वह दुर्दिन आ गया है जबकि जिस मदालसा को अपनी छोटी बहन माना, जिसे जीवन जीने की शिक्षा दी, वह मदालसा आज मेरे सामने ही अपने जीवन की बलि चढा दे। वैसे मदालसा का यह कृत्य गलत भी तो नहीं है। अपने सतीत्व की रक्षा अपने प्राण देकर भी करना निश्चित ही कोई आत्महत्या नहीं है। वास्तव में यही तो एक स्त्री के आत्मा की रक्षा है।
” रुको पुत्री। अभी रुको।”
मदालसा प्रज्वलित अग्नि में प्रवेश करती कि स्नेह के शव्दों को सुन रुक गयी। कभी कुण्डला को उसके जीवन का ध्येय बताने बाली देवधेनु माता कामधेनु उनके समक्ष खड़ी थीं। कुण्डला सहित मदालसा ने माता को प्रणाम किया।
” यह क्या मदालसा। इस तरह हारकर अपना जीवन त्याग देना किस तरह श्रेष्ठ है। जैसे रात्रि के बाद दिन आता है, उसी तरह दुखों के बाद सुख भी आते हैं।”
” माता। निश्चित ही ये सैद्धांतिक बातें कभी कभी पूर्ण सत्य नहीं होतीं। लगता है कि यह संसार उससे अधिक दुखद है जितना कि समझा जाता है। फिर एक कन्या की व्यथा कोई भी सुनना नहीं चाहता। निर्दोष को भी दोषी सिद्ध करता है। फिर सम्मान रहित होकर किस तरह जीवन। “
” मदालसा । एक स्त्री को सम्मान के लिये पुरुषों से प्रमाणपत्र की कैसी अपेक्षा। एक स्त्री खुद समाज को राह दिखाती है। उसे किसी से राह पाने की किस तरह आशा। “
मदालसा कुछ क्षण शांत रह गयी। अभी भी अनेकों विचारों का तूफान उसके मन में चल रहा था। माता कामधेनु उस स्थितियों को गहराई से निरीक्षण कर रही थीं। समझ गयीं कि मदालसा के चित्त को तब तक चैन नहीं मिलेगा जब तक कि उसके जीवन का कुछ सार उसे न सुना दिया जाये।
” मदालसा। अभी तुम्हारे जीवन का उद्देश्य है। अभी तुम्हें मानव समाज को राह दिखानी है। संसार को दिखाना है कि एक स्त्री किस तरह अनेकों का उद्धार कर सकती है।
जब धरतीलोक से पातालकेतु किसी राजकुमार के तीर से घायल होकर वापस पाताललोक आयेगा, उसी दिन समझ जाना कि कोई तुम्हें न केवल इस कैद से आजाद कराने आ रहा है, अपितु तुम्हें सम्मान दिलाने भी आ रहा है। वही राजकुमार तुम्हें अपने जीवन में स्वीकार करेगा। और तुम्हारा साथ उस राजकुमार के आध्यात्मिक उद्धार का भी कारण बनेगा। यही तुम्हारी नियति है। “
मदालसा को उसके भावी जीवन की जानकारी देकर माता कामधेनु चली गयीं। फिर एक नवीन दुख । आखिर वह राजकुमार कौन है जो मेरे जीवन का साथी होगा। मन से मन के तार जुड़े होते हैं। फिर मेरे मन में गोमती नदी के किनारे मिले राजकुमार के लिये प्रेम गीत क्यों। हे ईश्वर। यह क्या रहस्य है। किसी के प्रति प्रेम जगाकर किसे मेरे जीवन का ध्येय बनाया है। सचमुच परीक्षा की घड़ी है। और अभी प्रतीक्षा के अतिरिक्त कुछ अन्य हो भी नहीं सकता है।
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत ‘प्रशांत &
