स्त्रियों को अक्सर पुरुषों की अपेक्षा अधिक भावुक माना जाता है। इस कथन में कुछ सत्यता भी है। पर एक सत्य यह भी है कि स्त्रियों का मन धैर्य के तेज से दमकता है। आखिर क्यों न हो। माता पृथ्वी ने उन्हें धैर्य उपहार में जो दिया है। उन क्षणों में जबकि अनुमान लगाया जाता है कि स्त्रियों का मानस भावनाओं के प्रवाह में ही बह जायेगा, वे धैर्य रूपी चट्टान को मजबूती से पकड़ लेती हैं। फिर भावनाओं में इतना नहीं बहतीं कि किसी को उसके धर्म मार्ग से रोकने लगें। खुद कितने ही दुखों को अपने सीने में छिपा लेती हैं।
राजकुमार ऋतुध्वज को निमिषारण्य भेजने के प्रस्ताव पर भले ही रानी उतनी ही व्यस्थित हुईं जितने कि राजा। माॅ के स्नेह ने पिता के प्रेम की तुलना में अधिक ही जोर लगाया। रानी का मन बार बार पुत्र को मना करने का होता। पर फिर उसी धैर्य का अबलंबन ली रानी के व्यवहार से लगा ही नहीं कि उन्हें अपने पुत्र के जीवन की कोई चिंता भी है। तुरंत दासी से बोल पूजा की थाली मंगायी। राजकुमार ऋतुध्वज की आरती उतार उन्हें तिलक लगाकर विदा किया। आज राजकुमार अपने जीवन में पहली बार क्षत्रिय धर्म का पालन करने जा रहा था। संभावना थी कि उसका सामना पशुओं से नहीं अपितु छद्म रूप रखे असुरों से ही होगा। पर क्षत्राणी के आंखों से नीर न निकले।
मुनियों के साथ राजकुमार को निमिषारण्य पहुंचने में अधिक दिन न लगे। वैसे निमिषारण्य बहुत दूर था। पर गमन के अभ्यासी मुनियों और नित्य व्यायाम द्वारा शरीर को मजबूत बनाते रहे राजकुमार के लिये यह पथ बहुत अधिक न था। इतने समय में उसे मदालसा का स्मरण नहीं आया। अथवा वह मदालसा को कभी भूला ही नहीं था। मदालसा उसके मानस में इस तरह विराजित थी कि उसे भूलना राजकुमार के लिये असंभव था। पर कर्तव्य को प्रेम पर वरीयता देते हुए राजकुमार ने अपने प्रेम को भुला दिया।
निमिषारण्य का वन एक पवित्र शांति से व्याप्त कुछ अद्भुत सा लगा। हिंसक और अहिंसक जीव साथ साथ विचरते दिखे। लगता कि किसी को मृत्यु का भय ही नहीं। आश्चर्य था कि जिन जीवों को ईश्वर ने ही मांसभक्षी बनाया है, अहिंसा नीति से उनका जीवन किस तरह चलता है। किस तरह सभी तरह के जीव अपने अस्तित्व का रक्षण कर रहे हैं।
सत्य अनुमान से भी अधिक आश्चर्यजनक था। निमिषारण्य में तप करते मुनियों के तप के प्रभाव से वन्य जीव भी जीवन और मरण के सत्य से परिचित थे। शायद वे वन्य जीव भी योगभ्रष्ट साधक थे जो मानव जीवन में भी अप्राप्त को प्राप्त कर रहे थे। जीवो जीवस्य भोजनम्। पर कोई षड्यंत्र नहीं। मृत्यु की प्रतीक्षा में अंतिम समय देख रहे जीव खुद अपने शरीर को उन जीवों को दान कर देते थे जिन्हें ईश्वर ने आमिषभोजी बनाया है।
फिर सत्य है कि ऐसे वातावरण में उपद्रव करने बाले कोई पशु तो नहीं। वे मानव भी नहीं। वे निश्चित ही असुर हैं। और असुरों का वध अपरिहार्य है। आतताइयों से समाज की रक्षा करना ही तो क्षत्रिय का धर्म है।
आश्रम पर पहुंचते ही महर्षि गालव ने कुवलय को आवाज दी। राजकुमार कुवलय नामक किसी मुनि के आगमन की राह देख रहे थे। पर सामने आया एक अद्भुत अश्व। सामान्य अश्वों की तुलना में बहुत अधिक बड़ा, सामान्य अश्वों की तुलना में अधिक मजबूत, और एक विशिष्ट रंग का। अनेकों रंगों के अश्व देखने बाले राजकुमार ऋतुध्वज ने आज पहली बार स्वर्ण रंग का कोई अश्व देखा था।
” राजकुमार।” महर्षि गालव ने कहना आरंभ किया। ” यह अश्व कोई साधारण अश्व नहीं अपितु भगवान सूर्य द्वारा प्रदत्त दिव्य अश्व है। कोई भी स्थल इनके लिये अगम्य नहीं है। धरा, जल और गगन प्रत्येक स्थान पर समान क्षमता से लगातार बिना थके गमन कर सकता है। घोर अंधकार में भी इन्हें देखने में कोई समस्या नहीं है। आज से भगवान सूर्य प्रदत्त कुवलय ही आपके अश्व होगें। इस अश्व पर आरूढ हो आप न केवल सारे असुरों का दमन करो, अपितु भविष्य में भी अपने शत्रुओं को जीतने बाले बनो। “
राजकुमार और अश्व एक दूसरे को देखते रहे। फिर दोनों के चेहरे पर ही मंद मंद मुस्कान आ गयी। मानों दोनों का पहले से ही कोई संबंध हो। मानों दोनों बिछड़े हुए मित्र हों जो बहुत समय बाद मिले हों।
मित्रता वर्ण, सामाजिक स्थिति, आयु और लिंग से परे की अवधारणा है। मनुष्यों और पशुओं के मध्य भी मित्रता का संबंध बन सकता है। फिर अश्व और स्वान तो हमेशा अपने स्वामी के लिये अपने प्राण भी अर्पित करने में अग्रणी रहें हैं। स्वामिभक्ति भी मित्रता का ही एक रूप है। जबकि एक पशु और मनुष्य दोनों एक दूसरे के लिये अपरिहार्य बन जाते हैं। एक दूसरे पर खुद से भी बढकर विश्वास करने लगते हैं। एक दूसरे के दुख में दुखी होते हैं। और एक दूसरे के लिये अपने प्राणों की बाजी भी लगाने को तैयार रहते हैं। निश्चित ही यह भी एक तरह की मित्रता ही है। आज महर्षि गालव ने राजकुमार को अश्व अर्पित नहीं किया अपितु उनके जीवन का एक मित्र अर्पित किया जिसपर राजकुमार अपनी सामर्थ्य से भी अधिक भरोसा कर सकते हैं।
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत ‘प्रशांत’
