पातालकेतु की कैद में वंदी मदालसा कभी भी कैद से बाहर नहीं जाती थी। हालांकि कुण्डला स्वतंत्र घूमती रहती। अधर्मियों की क्षमता तेजस्वी नारियों को कैद करने में लगभग शून्य ही थी। लगता नहीं कि असुरों की सम्मिलित शक्ति मिलकर भी मदालसा को कैद रख पाती। पर मदालसा का बाहर न जाने के पीछे कुछ विशेष कारण थे। एक तो वह बाहर के वीभत्स दृश्यों से बचना चाहती थी। दूसरा उसे माता कामधेनु के वचनों पर पूर्ण विश्वास था। उसका जीवन साथी उसे कैद से आजाद कर ससम्मान अपने जीवन में स्थान देगा।
   सम्मान आजादी से किस तरह कमतर है। यथार्थ में सम्मानरहित आजादी कोई आजादी नहीं है। आजादी की व्यापक अवधारणा सम्मान से आरंभ होकर सम्मान पर ही समाप्त होती है।
   भविष्य के जीवन साथी के रूप में मदालसा के समक्ष हमेशा राजकुमार ऋतुध्वज का चेहरा ही आता। राजकुमार को छोड़ किसी अन्य से प्रीति कर पाने में वह खुद को असमर्थ पाती। स्त्रियों का प्रेम वैसे भी ज्यादातर एक बार पात्र का चयन कर फिर बदलाव नहीं करता है।
    यदि पूछा जाये कि इन परिस्थितियों में सबसे ज्यादा कौन आनंद ले रहा था तो इसका उत्तर प्रेम ही होगा। उसी प्रेम ने दोनों के मन को इस तरह वश में किया था। दोनों के मन में एक दूसरे से आशा का दीप प्रज्वलित कर रखा था।
   वीभत्स दिनों की गणना में वह दिन विशेष वीभत्स की श्रेणी में था। आखिर असुर अपने शासक पातालकेतु के नैत्रत्व में शूकर बन आखेट करने गये थे। असुर स्त्रियां अग्नि प्रज्ज्वलित कर उनपर बड़े बड़े कड़ाहों में तैल गर्म कर रही थीं। इन तेल में ही आखेट कर लाये पशुओं को तला जायेगा। बहुत सारे पशु जिनके प्राण ही नहीं निकले होगें, उनकी दर्द भरी चीत्कार सुन पाशविक नृत्य किया जायेगा। उम्मीद की जा रही थी कि संभवतः विभिन्न आखेट में इस बार कोई मनुष्य भी आखेट हो चुका हो।
  ऐसी तामसिक उपक्रम से दूर मदालसा और कुण्डला भीतर छिपे बैठे थे कि बाहर ज्यादा कोलाहल होने लगा। इस बार का कोलाहल कुछ अलग था। पशुओं की निरीह पुकार के स्थान पर घायल असुरों की पुकार से वातावरण गुंजायमान था। कुछ अलग तो हुआ है। संभव है कि आज वही क्षण आने बाला है जिसकी भविष्यवाणी माता कामधेनु ने की थी।
   असुर नारियों के गान बंद हो गये। घायल असुरों को देख स्त्रियों का भी विलाप आरंभ हो गया। इन घायल असुरों में पातालकेतु कहीं न था। सत्य बात थी कि असुरों को भी ज्ञात न था कि उनका शासक अब जीवित भी है अथवा नहीं। वे सभी तो पातालकेतु को अकेला छोड़ अपने प्राण बचा कर भाग आये थे। भय से थर थर कांपते किसी ने पीछे मुड़कर अपने नायक की कोई सुध नहीं ली।
   विभिन्न विलापों में रंभा का रुदन और मिल गया। लगा कि आसुरीय रुदन से आसमान ही फट जायेगा। तभी कुछ शांति सी हुई। रंभा का रुदन रुक गया। वास्तव में यह पहली बार हुआ था कि असुरों का समुदाय बिना आखेट के घायल होकर वापस आया था। वैसे उम्मीद तो नहीं थी कि घायल करने बाला राजकुमार इस गुप्त स्थल तक भी आ सकता है, फिर भी भय के कारण सभी के पैर कांप रहे थे। फिर ‘ वह आ गया, छिप जाओ, बड़ा वीर है, इस तरह तीर चलाता है कि पता ही नहीं चलता कि कब तीर तरकश से बाहर निकला और कब धनुष की ज्या पर चढ लक्ष्य की ओर बढ लिया। गुप्त स्थल पर भी पीछा करते आ गया है। फिर हमें कोई नहीं बचा सकता है। उचित है कि सभी छिप जायें।’ जैसी ध्वनियां वातावरण में गूंजने लगीं। उसके बाद ऐसी शांति छा गयी कि मानों वह निर्जन वस्ती हो। मृत्यु भय दिखा संसार में आतंक फैलाने की इच्छा रखने बाले मृत्यु की संभावित आहट सुन मृत्यु से पूर्व ही मृतक बन गये। एकदम निःशव्द, अपने अपने घरों में कैद। और राजकुमार का सामना करने के बजाय छिपने बालों में एक नाम था – पातालकेतु। नायक ही जब भय से घर में छिप गया, उस समय अन्य किसका साहस राजकुमार को रोकने का था। 
  विभिन्न परिस्थितियां और मदालसा के विभिन्न वाम अंगों में कंपन। लगता है कि वह आ गया, जिसके आगमन की प्रतीक्षा मदालसा को थी। पर आज भी मदालसा उठकर बाहर न निकली। एक बार उसे फिर से गोमती नदी के तट बाला राजकुमार याद आया। अब जबकि उसका भावी जीवन साथी गढ के बाहर तक आ चुका था, मदालसा अपने स्वप्न के राजकुमार के प्रेम ज्वर में उष्ण होने लगी। अभी तक स्वप्नों में राजकुमार ऋतुध्वज को आते देखती आयी मदालसा ठीक उसी समय नकरात्मक विचारों के प्रवाह में बहने लगी जबकि वास्तव में राजकुमार ऋतुध्वज ही वहाँ पहुँच चुका था। अपने प्रेमी की याद में मदालसा इस तरह विह्वल हो उठी कि शीघ्र ही अपना होश खो मूर्छित हो गयी। 
  किंकर्तव्यविमूढ़ कुण्डला समझ नहीं पा रही थी कि इस समय बाहर जाकर आगंतुक राजकुमार का पथ प्रशस्त करे या मूर्छित मदालसा की चिकित्सा करे।  इस समय अनजान नगरी में आगंतुक राजकुमार जो कि मदालसा का जीवन साथी भी बनेगा, को कुण्डला के परामर्श की आवश्यकता है। उसी समय मदालसा का मूर्छित हो जाना। एक साथ दो कर्तव्य कुण्डला को पुकार रहे थे और उन दोनों कर्तव्यों में से किसी एक का चयन सचमुच आसान न था। 
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत ‘प्रशांत’
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