मदालसा को मूर्छित देख राजकुमार ऋतुध्वज विकल हो गया। उसे एक क्षण की प्रतीक्षा भी असह्य हो रही थी। सामने कुण्डला को देख भले ही वह मर्यादा के कारण मदालसा के नजदीक नहीं जा पा रहा था पर मन के चलचित्र में इस समय मदालसा के सर को अपनी गोदी में रखकर विलाप कर रहा था। इतने समय ढूंढने के बाद जिसकी प्रेयसी ही उस दशा में मिले कि उसके जीवन और मरण पर भी संदेह हो, उसकी विकलता को व्यक्त कर पाना कब आसान होता है। इस समय राजकुमार को मदालसा के जीवन की चिंता हो रही थी। वैसे वह कभी भी अपना कार्य अपूर्ण रखने के पक्ष में न था, पर परिस्थितियों के अनुसार निर्णय बदला जाता है। यदि अभी मदालसा को सुरक्षित निमिषारण्य ले जाया गया तो उचित चिकित्सा मिलने पर वह स्वस्थ हो सकती है। असुरों के गढ का ज्ञान हो ही चुका है।
   प्रेम में विकल राजकुमार यही समझ रहा था कि असुरों की कैद में रह रही उसकी प्रेमिका अस्वस्थता के कारण मूर्छित हुई है। प्रेम भी एक तरह का रोग है, इस तरफ राजकुमार का विचार न था।
   राजकुमार अपने मन के विचारों को जिह्वा पर ला नहीं पा रहा था। उसके नैत्र पहले से ही अश्रुओं से भरे हुए थे। भले ही कुण्डला राजकुमार को नहीं पहचानती थी पर नारियों में स्वाभिमान की अलख जगाने के लिये विख्यात हुई कुण्डला को पहचानने में राजकुमार को देर न लगी। माता आदिशक्ति की सहयोगी रही कुण्डला के समक्ष राजकुमार ऋतुध्वज अपने दोनों हाथ जोड़कर खड़ा हो गया।
   ” वीर वेष में आये नवयुवक। आप इस नगरी के असुर तो नहीं लगते। वैसे हमेशा ही पाप का अंत होता है। आतताइयों को उन्हीं के गढ में धराशायी करने कोई न कोई अवश्य आता है। सच तो यही है कि यही ईश्वर के अवतरित होने की मान्यता का गहन भाव है। प्रत्येक मनुष्य ईश्वरीय क्षमता और गुणों से युक्त होता है। पर उन गुणों और क्षमताओं का ध्यान ही किसे होता है। कुछ ही अन्याय के प्रतिकार में अपने प्राणों की भी चिंता नहीं करते। वे ही ईश्वरीय गुणों को समझने बाले होते हैं। फिर ईश्वरीय गुणों को खुद में पूरी तरह से उतारने बाले उन साहसियों का साथ खुद ईश्वर देते हैं। लग रहा है कि आप भी ऐसे ही कोई ईश्वरीय गुणों को धारण करने बाले युवा हैं जो कि इस असुर नगरी में निर्भीक हो आ गये हैं। लगता है कि ये असुर जिसके भय से अपने भवनों में छिपे हुए हैं, वह आप ही हों। यह सत्य है अथवा आपका कुछ और परिचय है। “
   कुण्डला के प्रश्न को सुन राजकुमार कुछ पल रुका रहा। निश्चित ही उसी के कारण असुर भयभीत हैं। पर क्या यही उसका परिचय है। निश्चित ही उसका परिचय इससे अधिक विशाल है। उस विशाल परिचय को सही तरह परिभाषित करने के लिये कुछ अलग शव्दों का चयन आवश्यक लगा।
” देवी। आपका अनुमान सत्य है। इन असुरों को निमिषारण्य के वन में मैंने ही पराजित किया है। फिर उनका पीछा करते हुए मैं यहाँ तक आया हूं। पर मेरा परिचय इससे भी व्यापक है। मैं एक युवक हूं जिसका मानस एक कन्या से प्रेम करने लगा। जो अपनी प्रेमिका को लगातार ढूंढ रहा है। उसे असुरों के संहार के प्रयास में आज वह कन्या मिली है जो कि उसके मन मंदिर में विराजित है। अभी उसे ज्ञात हुआ है कि वह जिसे प्रेम करता है, वह भी उसे उतना ही प्रेम करती है। देवी। मैं ही वह राजकुमार ऋतुध्वज हूं जो कि मदालसा को गोमती नदी के तट पर मिला था। हम दोनों के मन में एक दूसरे के प्रति एक जैसे भाव यही व्यक्त करते हैं कि हम दोनों एक दूसरे के लिये ही बने हैं। देवी। मुझे मदालसा के स्वास्थ्य की चिंता हो रही है। लग रहा है कि अभी असुरों के संहार की अपेक्षा इन्हें सुरक्षित स्थान पर ले चलना अधिक आवश्यक है। आप मुझे अनुमति दें। “
    माता कामधेनु का वचन किसी अधूरी प्रेम कहानी की पृष्ठभूमि नहीं बन सकता है। मदालसा को मुक्त करने के लिये मदालसा के मानस प्रेमी का आगमन यही सिद्ध कर रहा था। इस समय मदालसा को सचेत करना अधिक आवश्यक लगा। कुछ प्रयासों के बाद मदालसा की चेतना वापस आ गयी। मदालसा की आंखों में फिर से आंसू आने लगे।
  ” मदालसा। अब आपकी आंखों में और अश्रु नहीं। इन आंसुओं को पोंछ दो। मेरे साथ मेरे राज्य चलो। सत्य कहता हूं कि मैं आपको अपनी अर्धांगिनी बनाना चाहता हू। जीवन पथ पर आपके साथ चलना चाहता हूं। मदालसा। क्या तुम्हें मेरा प्रस्ताव स्वीकार है।”
   ” नहीं राजकुमार। लगता नहीं कि यह संभव है। “
  ” पर क्यों मदालसा। अभी तो आप खुद अपने मुख से अपने मन की स्थिति बता रही थीं। आप मुझे प्रेम करती हैं। मैं भी आपको प्रेम करता हूं । प्रेम के बाद भी इस तरह प्रेम को अस्वीकार करना क्यों। यह निष्ठुरता ही तो है। आपके खुद के प्रति, मेरे प्रति और पवित्र प्रेम के भी प्रति। “
” सत्य कह रहे हैं राजकुमार। सत्य है कि जिस दिन से आपका दर्शन किया है, उसी दिन से केवल आपका चिंतन किया है। फिर भी हमारा मिलन संभव नहीं है। प्रेम कभी भी खुद का स्वार्थ नहीं। प्रेम कभी भी निजी सोच नहीं। जो प्रेम राष्ट्र की उन्नति को बाधित करे, ऐसे प्रेम का अपूर्ण रहना ही उचित है। “
  जिस क्षण मदालसा का प्रेम अपने लक्ष्य को प्राप्त करने ही बाला था, उस समय मदालसा के मन में यह विचार कि उसके प्रेम की परिणति राष्ट्र हित में नहीं रहेगी, सचमुच एक रहस्य था। जिसे पूरी तरह समझ पाने में राजकुमार ऋतुध्वज खुद को असमर्थ पा रहा था। 
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत ‘प्रशांत’
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