गोमती नदी के तट पर बसा छोटा राज्य जिसके नरेश महाराज शत्रुजित थे, एक विशाल राज्य में बदल गया। यह राजकुमार ऋतुध्वज की वीरता थी कि राज्य की सीमाएं गंगा, यमुना, नर्मदा, सरस्वती और सिंधु जैसी नदियों की रेखाओं को भी पार कर गयी। जब राजकुमार कुवलय पर आरूढ हो राज्य विस्तार के लिये निकलता तब अधिकांश राजा उसका प्रतिकार न कर उसकी आधीनता स्वीकार करना ही उचित समझते। धीरे धीरे लगभग पूरे उत्तर भारत में महाराज शत्रुजित का राज्य था। पर महाराज शत्रुजित कुछ दुखी थे। खुद शांति के पुजारी रहे महाराज शत्रुजित ने भले ही पुत्र के उत्साह को नहीं दबाया पर उनका मन कुछ खिन्न सा था। इस विषय में पिता और पुत्र के मत आरंभ से ही अलग थे। समय यह था कि राजकुमार की विजय नाद से प्रजा भी उत्साहित थी। राजकुमार के समर्थन में सभी लोग थे। और आखिर हो क्यों नहीं। राजकुमार की वीरता से पूरे भारत भर में राज्य को एक विशेष सम्मान जो मिला था। भविष्य के भी नरेश वही होंगें ।इस कारण से भी राजकुमार की नीतियों को सम्मान देना आवश्यक था। फिर भी कुछ था जो कि महाराज शत्रुजित के मन मानस को दुखी कर रहा था। वीरता में महाराज शत्रुजित भी किसी तरह कम न थे। फिर भी उन्होंने खुद राज्य विस्तार के प्रयासों को अपने जीवन में नहीं उतारा तो इसके पीछे भी एक विशेष कारण था। महाराज के संतोषी स्वभाव के आधारभूत कारण को राजकुमार समझ सकें, अभी ऐसी स्थिति न थी। फिर भी राजकुमार समझ रहे थे कि उनकी विजय गाथाओं को सुन पिता जी संतुष्ट नहीं हैं। वैसे आत्मविश्वासी असंतुष्टि का अर्थ ही प्रयासों में कमी ही मानता है। राजा की असंतुष्टि को राजकुमार अतिरिक्त प्रयासों से पूरा करने का प्रयास करता रहा। पर हर नवीन सफलता के बाद वह महाराज को और भी अधिक असंतुष्ट पाता।
समय गुजर रहा था। पिता को संतुष्ट न कर पाने की पीड़ा राजकुमार के मन को व्यथित कर रही थी। आखिर उसने दक्षिण देशों को अपने अधीन करने का निश्चय किया। अभी तक बहुत कम राजाओं ने दक्षिण देशों को अपने आधीन किया है।
सेना तैयार थी। अस्त्र शस्त्रों की पूजा हो चुकी। कुवलय रणभूमि में प्रस्थान करने के लिये तैयार खड़ा था। मदालसा ने राजकुमार को विजय तिलक कर दिया था। पर महाराज शत्रुजित से आशीर्वाद लेने के बाद ही राजकुमार ने विजय अभियान रोक देने की घोषणा कर दी। अक्सर महाराज के चेहरे पर दिखती चिंता की रेखाएं अब राजकुमार के चेहरे पर भी थीं। अद्भुत बात थी कि इस चिंता के कारण को समझ पाना किसी के लिये भी संभव न था। विजय और ऐश्वर्य के नाद के मध्य एक राजा की चिंता के कारण को समझ पाना वैसे भी आसान नहीं होता है। आज पहली बार राजकुमार को महाराज ने अपनी चिंता बतायी। फिर राजकुमार जो कि भविष्य का नरेश भी था, महाराज की चिंता को खुद में अनुभव करने लगा।
जो हो गया, उसे बदला नहीं जा सकता। पर सत्य यह भी है कि अब अतिरिक्त प्रयास करना होगा। तभी महाराज इस चिंता से पार पा सकेंगें। यही एक पुत्र का कर्तव्य है और यही एक युवराज का भी।
मदालसा देख रही थी अपने पति को तड़पते हुए। विवाह के बाद से दोनों के मध्य कुछ भी निजी न था। दोनों दूसरे की पीड़ा में दुखी होते और पूरी क्षमता से उसका निवारण करते। फिर मदालसा भी उस चिंता के कारण को नष्ट करने का उपाय ढूंढ रही थी। यह एक पत्नी के धर्म से भी बढकर भविष्य की रानी का धर्म था। आखिर एक राजा और रानी की चिंता का कारण केवल और केवल प्रजा ही तो होती है। खुद के जीवन की चिंता ही वे कब करते हैं। वर्तमान राजा के साथ साथ भविष्य के राजा और रानी की चिंता का कारण भी प्रजा का सुख ही था। सत्य बात थी कि राज्य विस्तार के साथ साथ अब प्रजा का भी विस्तार हुआ था। दूसरे राज्यों जिन्हें राजकुमार ने जीतकर अपने आधीन किया था, उनकी प्रजा भी तो अब राज्य की प्रजा ही थी। राजा का कर्तव्य है, प्रत्येक प्रजा के सुख दुखों का ज्ञान होना तथा उनका निवारण करना कब पूर्ण हो रहा है। जिन पर विश्वास किया जा रहा है, क्या वह विश्वस्त हैं, यह जानने का कब प्रयास किया गया है। सत्य तो यही है कि राज्य विस्तार की लालसा में लगातार प्रजा की उपेक्षा ही तो हो रही है। और जब तक प्रजा का एक भी व्यक्ति दुखी है, राजा को प्रसन्न होने का अधिकार ही क्या है। फिर तो वास्तव में प्रजा की स्थिति की सही सही जानकारी न होना, चिंता की तो बात ही है। और उससे भी अधिक चिंता की बात है कि प्रजा की स्थिति सुधारने का सही उपाय भी ज्ञात न होना।
न राजकुमार कुछ निश्चय कर पा रहे थे और न मदालसा। पर दोनों के अतिरिक्त कोई और था जो इस परिस्थिति से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता था। सही बात तो यही है कि मनुष्य बड़े बड़े तरीके ढूंढता रहता है। पर बहुत साधारण और प्रभावी तरीके भूल जाता है। गहरे जल के उत्कृष्ट तैराक छिछले जल में तैरने का प्रयास करने पर असफल होते हैं तथा असफलता के कारण को भी नहीं समझ पाते हैं। जबकि जिन्हें तैरना नहीं आता है, ऐसे लोग छिछले जल को केवल चलकर आसानी से पार कर लेते हैं।
कुवलय ने हिनहिनाकर संकेत दिया कि अभी तक राजकुमार को सफलता की सीढियाँ चढाता आया वह राजकुमार की चिंता का निवारण करना जानता है। सही बात तो यही है कि किसी की भी सफलता केवल उसके उद्यम का परिणाम नहीं होती। एक भवन की भव्यता नींव में छिपे गुप्त पाषाणों पर भी तो निर्भर होती है।
कुवलय पर आरूढ हो राजकुमार प्रतिदिन दूर दूर राज्यों तक जाता था। विभिन्न प्रजा से मिलता। उनकी समस्याओं को सुनता। उनका निराकरण करता। विश्वस्त और अविश्वस्त का भेद करता। केवल सीमा विस्तार से ही राज्य का विस्तार नहीं होता है। प्रजा के मन में राजा के प्रति विश्वास ही प्रमुख कारण है। फिर राजकुमार ऋतुध्वज के लगातार उद्यम करने से सचमुच राजा शत्रुजित का राज्य पूरे उत्तर भारत में फैल गया। पूरे उत्तर भारत की प्रजा अपने नरेश महाराज शत्रुजित और उससे भी अधिक भविष्य के नरेश राजकुमार ऋतुध्वज से संतुष्ट थी। राजा और राजकुमार के मानस से चिंता के बादल छट गये। महाराज शत्रुजित अब पूर्व की ही भांति प्रसन्न दिखने लगे। तथा उनकी यह प्रसन्नता प्रयास थी राजकुमार ऋतुध्वज के लगातार उद्यम का तथा एक परम तेजस्वी अश्व कुवलय के सहयोग का। सच्ची बात है कि जिसके जीवन में सच्चा मित्र हो, उसके लिये कुछ भी असंभव नहीं है। सच्चे मित्र कुवलय के कारण राजकुमार ऋतुध्वज वह कर पाने में समर्थ था जो कि दूसरों के लिये एक स्वप्न ही हो।
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत ‘प्रशांत’
