उस दिन राजकुमार को वापसी में देर हो रही थी। व्यवस्था किये बिना राजकुमार को वापस आना पसंद न था। इससे पूर्व भी कई बार देर रात तक वापस आये थे। कई बार दूर राज्यों में रुककर भी प्रजा की स्थिति जानते रहे थे । यह नियमित सा विषय था। पर आज जैसी वापसी की चिंता उन्हें कभी नहीं हुई थी। बार बार उन्हें प्रतीक्षा करती मदालसा का चेहरा दिखाई देने लगता। आज मदालसा उनके आगमन से पूर्व भोजन नहीं करेगी, ऐसा उन्हें अनुमान हो रहा था। मदालसा की क्षुधा वह स्वयं में अनुभव कर रहे थे। 
    बचपन से शिक्षण हेतु गुरुकुल में रहते आये तथा शिक्षण के बाद भी पिता के राज्य की उन्नति के लिये स्वयं को पूर्णतः लगा चुके राजकुमार ऋतुध्वज अभी बहुत सारी सामाजिक व्यवस्थाओं से अपरिचित थे। पूर्ण शिक्षित राजकुमार को भी जीवन में बार बार सीखने को मिल रहा था। जैसे कि उन्हें आज कुछ नवीन ज्ञान प्राप्त हुआ। स्त्रियों के पति प्रेम का ज्ञान।
   राजकुमार एक नवदंपत्ति की समस्या सुलझाते सुलझाते खुद विचारों के तूफान में उलझ गये। वास्तव में वह पुरुष पत्नी के पूजन की सामग्री बाजार से लेने घर से निकला पर कुसंग के प्रभाव में धन को मदिरा पान में लुटा आया। फिर होश आने पर पछताते हुए घर वापस आया। पत्नी की नाराजगी उचित ही थी। फिर आज तो वह पति की लंबी आयु के लिये ही उपवास रख रही थी। एक तरफ पत्नी पति का चिंतन कर करवा चतुर्थी का उपवास रख रही है और दूसरी तरफ पति को कोई जानकारी भी नहीं है।
   पति अपनी भूल स्वीकार कर रहा था। पुनः बाजार से आवश्यक वस्तुओं को लाने जा रहा था। राजकुमार ने भी बीच बचाब किया। तब कहीं स्थिति सुलझी। पर साथ ही साथ स्त्री की एक बात राजकुमार के मन में तीर की तरह चुभ गयी।
   ” मुझे तो लगता है कि सभी पुरुष स्त्रियों की उपेक्षा ही करते हैं। सामान्य हों या राजकुमार। कितनों को ज्ञात रहता है कि एक पत्नी का ध्यान, साधना और उपवास भी पति के हित की कामना से आरंभ होकर पति के हित की कामना पर ही समाप्त होता है।”
   फिर क्या वह भी मदालसा की उपेक्षा कर रहा है। क्या उसे मदालसा की स्थिति का पूर्ण ज्ञान नहीं।
  संभवतः यह स्त्री सत्य कह गयी है। आज मदालसा बहुत सुबह जगी थी। नहीं। संभवतः रात में ही जग गयी थी। कल रात ही माता जी ने कुछ मिठाइयां भेजी थीं। जिन्हें मदालसा चुपचाप खा रही थी। 
   ” आज तो रात में ही भूख लग गयी। या मिठाइयों का स्वाद नींद नहीं लेने दे रहा।” 
  प्रतिउत्तर में मदालसा मुस्करा दी। अरे मुझे ज्ञात ही नहीं था कि आज मदालसा ने मेरे लिये उपवास रखा है। संध्या काल के अवसान के बाद देवी रजनी तारागणों के साथ आ चुकी हैं। पर ताराओं के मध्य तारापति अभी उदित नहीं हुए। संभवतः वह भी आज स्त्रियों के धैर्य की परीक्षा ले रहे हैं। 
   आज राजकुमार को कुवलय की गति भी कम लग रही थी। सुबह मदालसा द्वारा की गयी विदा ध्यान में आ रही थी। मन में स्वयं के लिये एक क्षोभ था। पर साथ ही साथ मदालसा के लिये भी क्षोभ का एक अंकुर उपज चुका था। आखिर मदालसा का मुझपर इतना तो अधिकार था ही कि आज वह मुझे रोक लेती। फिर अधिकार का प्रयोग न करना, कहीं प्रेम की अवहेलना का प्रतीक तो नहीं। प्रेम केवल आज्ञा स्वीकार करना ही नहीं अपितु अधिकार प्रदर्शन भी तो है। छोटी मोटी नोकझोंक भी प्रेम को ही तो पुष्ट करती हैं। 
  मन के बाद, भगवान सूर्य की किरणों की गति बतायी है और इन दोनों के बाद विश्व में भगवान सूर्य द्वारा प्रदत्त अश्व कुवलय की गति है। आज कुवलय की असीम गति भी कम रह गयी जबकि अंतरिक्ष में भगवान चंद्र अवतरित हो गये। विवाहिता स्त्रियां भगवान चंद्र को जल अर्पित कर रही थीं। और राजकुमार का लक्ष्य अभी भी दूर था। 
   राजमहल में महारानी अपनी पुत्रवधू मदालसा को समझा रहीं थीं। क्षत्रियों में और राजपरिवार में तो विशेष रूप से कभी कभी पति की अनुपस्थिति में भी उपवास खोलना होता है। पर मदालसा राजकुमार की अनुपस्थिति में उपवास नहीं खोलना चाहती थी। मदालसा के निश्चय के समक्ष महाराज और महारानी दोनों ही बेबस थे। बस ईश्वर से प्रार्थना हो रही थी कि शीघ्र ही राजकुमार वापस आ जायें। 
   कुवलय के स्वर को सुन माता ने ईश्वर को धन्यवाद दिया। वैसे उन्हें लग ही नहीं रहा था कि आज राजकुमार वापस भी आयेंगें। सचमुच यह उनकी भी भूल थी। आज उन्हें राजकुमार को मदालसा के उपवास के विषय में बता देना चाहिये था। पर मदालसा ने ही मना कर दिया था।  पतिव्रता स्त्रियां कभी नहीं चाहतीं कि उनका पति अपने कर्तव्यों को भुला केवल उन्हीं की चिंता में लगा रहे। कर्तव्य विमुखता किसी भी तरह का प्रेम तो नहीं है। 
  रात आधी से अधिक गुजर चुकी थी। अपने कक्ष में प्रेम के इस स्वरूप को समझ राजकुमार की आंखों से नींद बहुत दूर जा चुकी थी। मदालसा  उसे कभी भी उसके कर्तव्यों से विमुख नहीं करेगी। और अपनी पीड़ा स्वयं ही झेल लेगी। क्या वह भी मदालसा से इस तरह प्रेम कर सकता है। संभवतः नहीं। संभवतः यही एक स्त्री का प्रेम है। पुरुष के प्रेम से बहुत आगे। 
   ” मदालसा। यदि कभी ऐसा हो गया कि मैं वापस ही नहीं आऊं। अपितु मेरे निधन का समाचार वापस आये।” 
” सत्य कहती हूं राजकुमार। उसके बाद मेरे प्राण एक क्षण के लिये भी मेरे शरीर में नहीं रुकेंगे। “
  भावावेश में राजकुमार ने मदालसा को अपने बाहुपाश में आलिंगन बद्ध कर लिया। हालांकि राजकुमार का मन अभी भी विचलित था। एक अन्य प्रश्न उसके मानस में उसके प्रेम की परीक्षा ले रहा था। यदि कभी ऐसा हुआ कि वह दूर देश से वापस आया और उसे मदालसा से मिलन के स्थान पर मदालसा के निधन का समाचार मिले। क्या वह भी मदालसा की भांति विश्वास से कह सकता है कि उसके बाद उसके प्राण एक क्षण के लिये भी उसके शरीर में नहीं रुकेंगे। 
   सचमुच विश्वास में यह कमी यही तो सिद्ध कर रही है कि उसका मदालसा के प्रति प्रेम, मदालसा के उसके प्रति प्रेम के समक्ष कहीं भी नहीं है। 
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत ‘प्रशांत’
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