इस हृदयहीन  समाज ने जिसे ‘विधवा’ सम्बोधन का काल घूंट दिया। 
तिल तिल जीने को मज़बूर किया। 
उसकी आँखो के सपने औ मन के सब रंग सोख लिए। 
जीवित जीवन को मृतप्राय बना दिया।
चलो,उठो, जागो उसके जीवन में रंग भरो।
उसके वैधव्य का फिर से सोलह श्रृंगार करो।
विवाह ही केवल नहीं ज़रूरी, जीवन जीने की चाह ज़रूरी है।
कुछ करने का उत्साह ज़रूरी है।
अपनी पहचान बनाना ज़रूरी है।
जीवन का लक्ष्य/अस्तित्व ज़रूरी है।
जब इतना कुछ हो जाएगा  विवाह तो चुटकियों में हो जाएगा।
नारी तो केवल सबला है,अबला बन फर्ज निभाती, निरीह की ताकत बनती है।
ज़रा उसके पंखों को हवा तो दो, वो आस्मां को छूकर आती है।
दिखाना नहीं सोच बदल डालो। 
इतिहास ने बड़े प्रयास किए,
विधवा को सधवा बनाने के,
पर आज भी यह संबोधन लांछन सा ही दिखता है।
सामाजिक व्यथा तीर जो चुभता है।
उसको निकाल कर फेंकना है।
अधरों पर मुस्कान और खुशियों से मेल कराना है।
कुछ ऐसा उपक्रम करना है,
समाज को वैधव्य के दंश से बाहर लाना है।
धन्यवाद!
रचयिता – सुषमा श्रीवास्तव, 
मौलिक कृति
सर्वाधिकार सुरक्षित 
उत्तराखंड।
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