“अमन.. अर्जुन,. अभिनव.. सब आओ यहाँ..! 
जी पापा जी.?”
पापा जी की एक आवाज सुन तीनों बेटे पास आ गए!
“बेटा ! अगले हफ्ते शरत पूर्णिमा है.. इस बार की तैयारी भब्य  होनी  चाहिए.. रात भर कीर्तन का आयोजन होगा और सुबह खीर का प्रसाद वितरण होगा! तुम सभी अपना-अपना कार्य संभाल लो!”
दादाजी निर्देश दिए! 
“हाँ पापा जी! मैं कीर्तन मंडली को बुला दूंगा!”
अमन भैया ने कहा! 
“मैं हलवाई का प्रबंध करता हूँ पापा!”
अर्जुन भैया ने कहा! 
“मैं अर्चना को बुलाने जाउंगा 
फिर सबको होस्ट कर लूंगा!” 
अभिनव भैया ने कहा!
और पूजा की तैयारी के लिए मैं हूँ ना! नीलू भाभी ने कहा! 
दादाजी के मन में लड्डू फूटने लगे! 
“इसबार बेटी के साथ जमाई भी हमारे घर पूजा में शामिल होंगे…हमारे कहने से पहले ही तुम्हारे बच्चों ने अर्चना को बुलाने की पहल की.. अब हमारे बहू बेटे अपना दायित्व समझने लगे हैं.. ये सब तुम्हारे परवरिश की देन है अमन की माँ !”  दादाजी ने अपना मनोभाव ब्यक्त किया! 
“हाँ! और बच्चों के प्रति आपका  अनुशासित ब्यवहार भी 
बहुत मायने रखता है!” 
दादी जी ने अपनी प्रतिक्रिया दी ! 
“पापा जी आप अनुमति दें तो रानी को आज उसके मायके घुमा लाउं..? अभिनव ने सर झुकाए हुए पूछा!
हाँ पापा जी .. मम्मी कई दिनों से मिलने को बुला रही हैं!” रानी भाभी ने सहमति ब्यक्त की! 
“हाँ क्यों नहीं..? जाओ..बहू रुकना चाहे तो दो दिन छोड़ देना.. उसका भी मन बहल जाएगा!” माँ बुला रही हैं तो तुम्हे जाना चाहिए था!”
दादाजी ने सहर्ष अनुमति दी! 
“हाँ पापा! पर आपके अनुमति बिना तो मैं स्वर्ग में भी नहीं जाना चाहूंगा!”
अभिनव पुनः बोल पड़ा ! 
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बहु-बेटे और पौत्र-पौत्रियों के सान्निध्य में  दादाजी का जीवन सानंद ब्यतीत हो रहा है…समय अपने रफ्तार से निकल रहा है.! .दादाजी की आंखों पर एनक लगा है! दादीजी साइटिका की पेशेंट हो गइ हैं! उठने बैठने में परेशानी हो रही है! अब उन्हें सेवा की अत्यधिक आवश्यकता है! बड़े बेटे अपनी फैमिली के साथ मेन सीटी में सिफ्ट हैं! अर्जुन का फर्नीचर का ब्यवसाय है ! उनके बच्चे हास्टल में पढते हैं आगे दुकान पीछे मकान है जहाँ अर्जुन अपनी पत्नी के साथ रहता है! 
  छोटे बेटे अभिनव अपनी पत्नी और बच्चों के साथ माता पिता के साथ रहते हैं!
“रानी! मैं जा रहा हूँ माँ की दवा लेने..!”
अभिनव निकलते हुए बोला! 
“सुनो! मुझे भी चलना है.. रानी ने कहा! 
कुछ चाहिए तो बोलो मैं ले आउंगा! 
माँ को देखना जरुरी है.. कहीं उन्हें कोई आवश्यकता हुई तो..?”अभिनव ने चिंता जाहिर की! 
“पार्लर जाना है मुझे.. कितने केयरलेस रहते हो तुम..? मेरी कोई फिक्र नही है.. रोज का तो यही लगा है.. मुझे वक्त मिलता ही कब है..?”
रानी ने खीझते हुए कहा! 
“ओके! रानी कल ले चलूंगा .. प्रामीस.. !” अभिनव ने कहा! और वैन स्टार्ट कर दिया! 
प्रायः ऐसा होता रहता! 
रानी की  जिम्मेदारी बढ गई थी! पापा जी के लिए सुबह शाम पूजा की तैयारी करना.. माँ के लिए समय पर गर्म पानी देना.. तेल मालीश करना.. बच्चों के देखरेख के साथ रसोई कार्य भी करना था! 
रानी बहुत अच्छे से अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह कर रही थी.. अभिनव भी यथासंभव रानी का पूरा सहयोग करता था! 
“रानी बहू.. संध्या करने जा रहा हूँ मैं.. !”
अपनी माँ को देखना! पापा जी आसनी लगा कर बैठ गए! 
रानी ..माँ जी के पैर में तेल मालीश करने लगी! 
अब कैसा फील हो रहा है माँ? रानी ने पूछा! 
“बहुत आराम है बेटी..!”इस तेल से मुझे बहुत फायदा हुआ है!
अच्छा माँ जी..! अब मैं कीचन में जा रही हूँ! रानी ने तेल की शीशी  को यथास्थान रखा और कीचन के कार्यों में लग गई! 
अभिनव पापा जी के कमरे में आया तो पापा जी बड़े भईया से फोन पर बात कर रहे थे! 
भईया- ” पापा! राहूल  का उपनयन संस्कार करना है इस वर्ष … आप मुहुर्त देख कर बताईए.. !” 
पापा- “हाँ बेटा! मैं सोच रहा हूँ साथ में भागवत् कथा का आयोजन भी हो जाता .. तुम्हारी माँ की अवस्था ढल रही है अब.. उसे सहारे की जरूरत पड़ रही है.. अकेली रानी बहू परेशान हो जाती है.. तुम सब चाहो तो हम सभी साथ रहें.. यहाँ अपनी पुश्तैनी मकान है और वहाँ तुम फ्लैट का किराया भरते हो..? शहर भी कुछ अधिक दूर नहीं है बच्चे यहाँ से भी पढ सकते हैं.. जो प्लैट का खर्च है उसमें वैन का खर्च निकल जाएगा! अब बुढ़ापे में हमारा आक्सीजन पोते पोतियां हीं तो है.!”
“अच्छा! देखता हूँ पापा.. आप सही कह रहे हैं..एक घंटे का समय लगता है मेन सीटी में जाने के लिए..हम मैनेज कर लेंगे!”
“अच्छा पापा  
प्रणाम!”
और अमन ने फोन काट दिया! 
“क्या एडवाईज किया पापा ने. बड़ी लम्बी बात हुई आज.. ?”
नीलू ने उत्सुकतावश  पूछा! 
“हाँ नीलू! पापा चाहते हैं उपनयन के साथ माँ भागवत भी सुन लें.. कैसा रहेगा.?”
“अच्छा तो है.?”
नीलू ने संक्षिप्त उत्तर दिया! 
“हाँ! और नेक्स्ट सेशन से हम सभी बच्चों को लेकर अपने पुश्तैनी मकान में रहेंगे.. माँ पापा के साथ.कैसा रहेगा?”
“ये सब तुम सोच लो अमन .. अभी तो हम अपना घर भी नहीं ले सके हैं.. घर रहने का मतलब माँ पापा के ट्रीटमेंट का खर्च भी वहन करना होगा.. बच्चों के स्कूल वैन का झंझट भी रहेगा,.. यहाँ से तो स्कूल पास है मैं छोड़ देती हूँ.. वहाँ तुम्हे एक घंटे पहले निकलना होगा.. एक घर का किराया बचाने के लिए कितना खर्च उठाओगे तुम.?” 
नीलू ने अपनी बात पूरी कर ली! 
” नीलू..! सबकुछ तो है पापा का दिया हमारे पास.. उनके आशीर्वाद से हमारी अच्छी अर्नींग हो रही है.. सब मैनेज हो जाएगा.. अभिनव भी तो अकेले संभालता है सबकुछ.. रानी भी परेशान है अकेले.. हम सभी साथ होंगे तो बच्चों को अच्छा इनवायरमेंट मिलेगा.. बच्चे संयुक्त परिवार का महत्व समझ लेंगे.. दादा- दादी के सान्निध्य में बच्चों को उत्तम संस्कार प्राप्त होगा..!यही तो वह समय होता है जब हम पुत्र होने का कर्तव्य अदा करते हैं.!” 
अमन प्रसन्नता पुर्वक अपने शब्दों को ब्यक्त कर रहा था! 
और नीलू की मुख मुद्रा परिवर्तित हो रही थी.. ! 
” मैं मना भी नहीं कर रही तुम्हें.. अभिनव के पास पापा का पूरा पेंशन है.. घर का किराया भी अभिनव के कब्जे में है.. हमतुम घर में बड़े हैं..हमारा फर्ज सिर्फ देना होगा  मांगना नहीं.. अभी तुम्हे उपनयन के साथ भागवत कथा का खर्च भी देना होगा.. लाखों लगते हैं भागवत कथा करवाने में..तुम पुत्र का कर्तव्य अदा करो और वे  पापा के रुपयों पर ऐश करेंगे..!”
नीलू ने कई ऐसे उदाहरण दिए और अमन का विचार परिवर्तित करने में सफल हो गई! 
क्रमशः-
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