उपन्यास से एक अँश- 
“क्या होता है वृद्धाश्रम..?”
एक बुजुर्ग दंपत्ति चाहता है कि जीवन के उत्तरार्ध में वह अपने पौत्र-पौत्रियों के साथ पुनः अपना बचपन जी ले.. अपने बनाये घरौंदे में खेले.. पर अफसोस कि अब ये सपने अधुरे से लग रहे हैं…आज हमारे देश में शिक्षा पर बहुत जोर दिया जा रहा है.. माता पिता अपने बच्चों को किताबी ज्ञान से परिपूर्ण कर देते हैं.. अनेकानेक मुसीबतों का सामना कर के धनार्जन कर अपने पाल्यों  की ख्वाहिशें पूरी करते हैं..  जिन प्रश्नों का उत्तर बड़े बुजुर्गों के सान्निध्य में प्राप्त हो जाता है, उन प्रश्नों में बच्चे  अकेले उलझ जाते हैं.. उँची उपाधियाँ प्राप्त करने के बाद भी जब बच्चे संस्कार जैसे तत्व से पृथक रहते हैं..ऐसे परिवेश में आवश्यकता होती है वृद्धाश्रम की.. जहाँ कुछ पल के लिए हमारे बुजुर्ग अपनी ब्यथा को एक दूसरे से बाँट सके..!”
सुरभी-“थोड़ा खिसक जा यार.. खड़े हो कर थक गई मैं..! 
इतनी भीड़ में भी जगह मिल गइ तुझे? मैं तो तबसे धक्के खा रही हूँ.!” 
शैली-“हाँ यार बड़ी मुश्किल से यहाँ तक पहुँची हूँ मैं…पीछे नजर दौड़ाया तो यही एक सीट खाली नजर आई!” 
सुरभी-“ऐसा कर तू मेरी गोद में बैठ जा थकान भी दूर हो जाएगी मेरी!” 
शैली-“मुझे पागल घोषित करना चाहती है क्या तू..? 
हा..हा..हा..हा.
एक बार ट्रेन चलने तो दो मैडम.. 
गर्मी से बुरा हाल है मेरा!” 
सुरभी-“मेरा पर्स देना.. अभी सारे यात्री बाहर हैं तबतक मैं एड्रेस देख लूं..!”
सुरभी ने पर्स में से अपना मोबाईल निकाला और एड्रेस देखने लगी! सुरभी और शैली अपने कजन की शादी में मेरठ जा रही थी! दोनों आमने-सामने बैठी थी! 
ट्रेन की सीटी बजी.. कुछ ही देर में यात्री ट्रेन में चढने लगे! पर आश्चर्य कि इस डब्बे में अबतक कोई नहीं आया! 
ट्रेन चल पड़ी सुरभी को नींद आ रही थी.. वह उठी और सामने वाले सीट पर जा कर सो गई! 
शैली ने एक मैगज़ीन निकाला और पढने लगी! 
ट्रेन अपनी रफ्तार में थी! दोनों सहेलियाँ बेफिक्र हो कर सफर का आनंद ले रही थी तभी वहाँ एक हैंडसम लड़के की एन्ट्री हुई! 
“ओ हैलो मैडम! ये सीट मेरी है.. !” 
सुरभी किसी लड़के की आवाज सुन कर चौंक गई! 
.”सुरभी ने सर उठा कर देखा..!”
“आप ही से कह रहा हूँ!”
वह पुनः बोल पड़ा! 
सुरभी ने सर से पैर तक सरसरी निगाहों से उसे देखा! 
एक लंबा और खूबसूरत लड़का उसके सामने खड़ा था! यलो टीशर्ट और ब्लैक जींस में वह एकदम हीरो लग रहा था! 
सौरभ मेहता! मेरठ..उसकी आइ डी कार्ड पर सुरभी की नजर पड़ी! 
और उसके बोलने का अंदाज भी कमाल का था! जिसे सुनकर अभी तक सुरभी कुछ बोल नहीं पाई थी! 
“दो मीनट से आप मुझे देखे जा रही हैं.. इस जुर्म के तहत मैं आपको अंदर भी करवा सकता हूँ..!” 
वह सुरभी की आंखों में देखते हुए बोला! 
“क्.. क.. क्या.. आपकी सीट है ये..?”
सुरभी घबराई हुई आवाज में बोली! 
“अबतक क्या सुना आपने..?” वह अपनी हंसी छिपाते हुए पुनः बोल पड़ा! 
“ओके! आप बैठिए.. !”
कहते हुए सुरभी वहाँ से उठकर सामने वाली सीट पर बैठ गई जहाँ शैली सो रही थी! ट्रेन के विंडो से अच्छी हवा भी आ रही थी.. पर सुरभी के माथे पर पसीना साफ दिख रहा था!
“हमने सीट खाली देखा तो वहाँ बैठ गई थी!”
सुरभी खुद को संयत करते हुए बोली! 
“नो मेंशन!”
सौरभ ने कहा और अपनी सीट पर लेट गया! 
सौरभ समझ गया कि इस रुट में ये नई लङकी है और
शायद अनकंफर्ट फिल कर रही है.. इसे कंफर्ट जोन में
लाना होगा! यह सोचकर उसने अपने जेब में हाथ डाला
और एक टाफी निकाला और रैपर हटाया! 
सौरभ अचानक उठ कर बैठ गया और सुरभी को देखा तो
सुरभी उसी की तरफ देख रही थी! नजर मिलते ही सुरभी ने अपनी नजरें झुका ली..! 
वह सुरभी को टाफी  दिखाते  हुए बोला.. डू यू लाईक इट?”
सुरभी ने टाफी देखा और -जी नहीं!”
बहुत देखी है ऐसी टाफी.. सुरभी मन ही मन बुदबुदाई! 
“ओके! अस योर वीस.. मैं किसी और को बुलाता हूँ..!”
कहते हुए सौरभ ने अपना फोन उठाया!  सुरभी  को परेशान करने में सौरभ को एक अलग ही आनंद की अनुभूति हो रही थी…! 
सुरभी का दिल धक-धक करने लगा.. पता नहीं कैसा आदमी है ये.. पहली नजर में ही मैं हिप्टोनाईज हो गई..! इससे दोस्ती कर लेना ही ठीक है.. क्या पता सफर में कहीं..? 
“एक्सयूज मी! फोन चार्जर है आपके पास?”
सुरभी ने बात करने का बहाना ढूंढा! 
“वो तो आपने आते ही चुरा लिया.. सौरभ तपाक से बोल पड़ा!” 
“क्या मतलब..?  मैं चोर दिख रही हूँ?”
सुरभी आश्चर्य से बोली! 
“और हमने कब क्या चुराया आपका?”
शैली ने उसका साथ दिया! 
“मोहतरमा! एक तो जबरन हमारी सीट पर कब्जा कर रही हैं आपलोग…और फिर हमारा चित्त चुराने की कोशिश.!”. 
सौरभ मन ही मन बुदबुदाया! 
शैली- “क्या मतलब?” 
“अब आप दोनों मिल कर हमें लूटने की प्लानिंग भी कर रही हैं!” हेल्प मी ओ गाड! सौरभ ने रोनी सूरत बनाते हुए कहा! 
सुरभी- “ईनफ.. अब आप लिमीट क्रास कर रहे हैं!”  
सौरभ-“लिमीट बनते ही हैं क्रास करने के लिए..,!”
शैली-“आप  हमपर चोरी का इल्जाम.,? दिमाग ठीक नहीं है आपका,..?” 
सौरभ-” दिमाग तो आपको देखते ही दिल से बगावत कर बैठा!”
शैली- “बस कीजिए वर्ना सच में हम दोनों उठा कर फेंक देंगे आपको..खिड़की  से बाहर.!”
सौरभ-” ओ रियली..? मैं तो चोर समझता था आप तो कातिल भी हैं.. हेल्प मी गाड!” 
सुरभी- “आपको सीट चाहिए तो ले लीजिए हम जा रहे हैं.. पर ये बेवजह झगड़े मत करिए.. !”
पर वास्तव में सुरभी को उसके  हर लफ्ज़ पर प्यार आ रहा था.,.!
सुरभी का हृदय स्पंदन बढता जा रहा था..! सौरभ की नजरों का सामना करना मुश्किल लग रहा था.. पर ऐसा लग रहा था जैसे ये सफर कभी खत्म ही न हो..!” एक अजीब सी कशिश  थी सौरभ में.।जहाँ सुरभी खींची चली जा रही थी! 
सौरभ- “दो हसीनाओं के साथ का सफर है ये..  ऐसे कैसे जाने दूं..?”
“तो..? क्या चाहते हैं आप?” शैली निडर होकर बोली! 
“अपने जान की हिफाजत चाहता हूँ.. मुझे तो   जान  माल का खतरा नजर आ रहा है..!” 
सौरभ बनावटी डर के साथ बोला! 
“ए मिस्टर- हमारे दुश्मन नहीं हैं आप..?” 
सौरभ को पहली नजर में सुरभी अच्छी लगने लगी.. वो बिलकुल फ्रैंक बात करना चाहता था.. पर वो समझ गया था कि सुरभी बहुत अच्छी लड़की है.. जल्दबाजी सही नहीं है.. धीरे -धीरे आगे बढ़ते हैं..!”
अच्छा! 
क्रमशः-
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