एक समय था जब विधवा विवाह समाज में मान्य नहीं था। पर जैसे-जैसे साक्षरता बढ़ती गई, समाज सुधारकों ने इस दिशा में एक नई पहल आरंभ की और विधवा विवाह को मान्यता मिलने लगी।
बाल्यकाल में ही लड़कियों का विवाह अपने से दोगुनी, तिगुनी आयु के लोगों से कर दी जाती थी। जो कुछ ही समय में ब्रह्मलीन हो जाते थे और आठ से दस वर्ष की उस बालिका पर विधवा होने का कलंक लग जाता था। और सारी उम्र उसको अंधेरे कमरों में ही जीवन गुजारना पड़ता था। ऐसे में उन पर हर तरह के ज़ुल्म किये जाते थे।
उन्हें या तो अपने पति की चिता के साथ ही जलना होता था या केश मुंडन करके एक चोगे में ही रहना होता था। यह एक विडम्बना थी कि समाज में महिला के विधवा होते ही उसे अशुभ मान लिया जाता था, उसकी परछाईं भी यदि विवाहित स्त्री पर पड़ जाती तो कोहराम मच जाता था।
सत्रहवीं शताब्दी में मालवा राज्य में जब रानी अहिल्याबाई होलकर के श्वसुर जी का शासन था, तब रानी अहिल्याबाई ने विधवा पुनर्विवाह के लिए सतत प्रयास किए और अपनी ही विधवा सखी का पुनर्विवाह करवाया था। तब उनको इस कार्य के लिए समाज में भर्त्सना हुई थी। फिर भी सूबेदार मल्हार राव होलकर के हस्तक्षेप से वो अपने प्रयास में सफल हो ही गईं थीं।
भारत में विधवा पुनर्विवाह का कानून तब बना जब समाज सुधारक श्री ईश्वर चन्द्र विद्यासागर जी ने बंगाल, विशेषकर कलकत्ता में विधवा लड़कियों की निकृष्ट स्थिती देखी। उन्होंने उस समय पाराशर संहिता का अध्ययन किया और उसके आधार पर यह पाया कि प्राचीन काल में भी विधवाओं को पुनर्विवाह करने की अनुमति प्राप्त थी। 
तब अंग्रेज गवर्नर जनरल लार्ड कैनिंग के शासन काल में एक अधिनियम बनवाया जो 16 जुलाई 1856 को विधवा पुनर्विवाह अधिनियम के नाम से जाना गया। इस अधिनियम के अनुसार हिन्दू विधवा लड़कियों को एक बार पुनः अपना परिवार बसाने की अनुमति थी। जिसका एक नियम यह था कि उस स्त्री को अपने पहले पति की संपत्ति में से अपनी हिस्सेदारी छोड़ना होगी। 
महिला को अपने सगे संबंधियों की अनुमति अतिआवश्यक है। खासकर यदि वह नाबालिग है तो।
किन्तु  समाज में इसका घोर विरोध हुआ और जब वह अपने मित्र का विवाह दस वर्ष की विधवा बालिका से करवा रहे थे तब कलकत्ता में बहुत ही विकट स्थिति बन गई थी, पुलिस की कड़ी निगरानी में उस बालिका का विवाह हुआ, जो उनकी माता जी के सहयोग से संभव हो सका जो स्वयं भी एक विधवा थीं। इस तरह ईश्वर चन्द्र विद्यासागर जी को बड़ी सफलता मिली।
उन्होंने अपने पुत्र का विवाह भी एक विधवा से ही करवाया था।
किन्तु आज लगभग डेढ़ सौ वर्षों बाद भी समाज में वह बदलाव नहीं आया है कि पढ़ी-लिखी स्वयं के पैरों पर खड़ी विधवा महिला पुनर्विवाह कर सके। आज भी हमारे समाज के बहुत से लोग सहमत नहीं होते।
परन्तु यह एक कड़वा सच है कि यह एक कुरीति है जिसका विरोध करना ही चाहिए। ताकि हर स्त्री सम्मान से जी सके। हम सभी को यह प्रयास करना ही चाहिए कि यदि विधवा महिला का पुनर्विवाह हो सके तो समाज की भलाई में यह एक उत्तम कार्य होगा।
© मनीषा अग्रवाल
मौलिक, स्वरचित रचना
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