हरी भरी वसुंधरा का हाल हुआ बेहाल
देख दशा धरा की रो पड़ा आकाश
सृष्टि ये पुकार रही ,वेदना के गीत गा रही
क्यों किया इंसान ने धरा पर अत्याचार है
हरे भरे खेत खलिहान अब सिमट रहे हैं
हरियाली खत्म हुई इमारतें बन रहे हैं
निर्मल स्वच्छ नदी का भी किया बुरा हाल है
नदियों के बहाव का ,रास्ता जो रुका अगर
राह न मिली अगर तो नदी ढूंढ लेगी डगर
फिर होगा गाँव शहर का हाल विकराल है
प्रदूषण फैल रहा हर तरफ धूल का गुबार है
महंगाई की मार से ,मच रहा हाहाकार है
जाति धर्म के नाम पर ,बंट रहा इंसान है
अपने स्वार्थ की खातिर ,बाँट दिया भगवान है
नेहा शर्मा
