जब….
धरा पर फूलों की बहार
अलौकिक आनंद छटा बिखरती है
शोभा अनंत नव कोपल फूटे
फागुनी बयार चहूंओर बहती है
तब लगता है वसंत आया है।
प्रेमी की कल्पनाओं का चाँद
धरती पर उतर आता है
गुलाबी अधरों पर प्रेमिका के
आंसू मोती बन चमक जाता है
कोमल, स्नेहिल भावों में उनके
मन मंद मंद मुस्काता है
तब लगता है वसंत आया है।
अपेक्षाओं को मनमाफिक
एक घर मिल जाता है
बेबस लाचार कोई मन
भर तृप्ति पा जाता है
भूखा कोई अन्न में
अमृत का स्वाद पा जाता है
तब लगता है बसंत आया है।
पिता अपना दर्द बच्चों की
आँखों में पाता है
माता को अपने सृजन का
पूर्ण मोल मिल जाता है
बहू को ससुराल में
बेटी सा मान मिल पाता है
तब लगता है वसंत आया है।
अनजान नगरी में दुनिया के
कोई हंस कर गले लगाता है
अनछुएँ अहसासों को कोई
शब्दों का जहां मिल जाता है
वातावरण ये आसपास का
असीम खुशियों से भर जाता है
तब लगता है वसंत आया है।
स्वरचित
शैली भागवत ‘आस’
