लोकतंत्र के फिर से त्योहार बा आयल।
सगरों पोस्टर पोस्टर बैनर बा छायल।
सगरो नेताजी के हो हल्ला मचल बा।
देखत ह ऊ , उ ओनकर केतना गल्ला भरल बा।
पैसा पैसा फिर बटाई।
गरीबन के फिर से जेबा कटाई।
भीड़ पे भीड़ लगा दिहे नेता।
जीते पे दुआरी से भगा दिहे नेता।
वादन के सगरो झड़ी लगहिहन ।
फिर से जनता के मुर्ख बनहिहन।
धरम पे सबके लड़ा दिहन नेता।
जीत की हैट्रिक लगा दिहन नेता।
पिछले बार जवन कईली
उ अबकी कराईब।
दुआरी दुआरी का।
घरों में रोड बनवाईब।
एहु बार हमके चुन लिह नेता।
बनब हमही सगरो विजेता।
दारू बटवा के ओंट हम पाइब ।
जनता के फिर से चोट पहुंचाईब।
पैसा खरच के बनली हम नेता ।
जहां से मिली अब हर जगह लपेटा।
सर्वेन्द्र मिश्र सर्वप्रिय✍️✍️✍️✍️
