बदनियति तुम्हारे नजरों कि जो
दिलो-दिमाग को तेरे गुमराह करती है
और कदम अपने बढ़ा चलते हो
लिए मिज़ाज आशिकी के पैंतरे ढकोसलें
एक तरफा ही ना जाने कैसी कैसी चाहतों
के दीवानगी लिए मचलते अरमानों को बेक़रार करते हुये
प्रेम का जाल बिछाना तो
फितरत होती तेरी फूल और पैगामों के फेहरिस्त भेज के
वक्त बेवक्त तेरे आने की आहट पर वो
सहम जाती धड़कनों की रफ्तार तेज कर किसी कोने में
जिंदगी बसर होती तेरी संग लिए नापाक इरादों को को
और हंस के लेता बड़े मजे तू किसी फूल के कुम्हलाने के
झूठा प्रेम दिखा स्त्री को बदनाम करने की जुर्रत करते हो
नहीं बंधना चाहती मोहपाश में वह किसी अन्जान फ़रेबी के
क्योंकि तुम्हारे खोट़े मन का रिवाज़ है जो
बात जमाने तलक पहुंचेगी जब लांछन मुझपे ही लगा जाओगे
मनुष्य की प्रवृत्ति है जब वह अपने ही बुने हुए जाल में फंसता है तो खुद को दोषी ना ठहराते हुए वह किसी और पर ही अपनी गलती मढ़ देता है मनुष्य अपने बचाव में झूठ भी बोल सकता हैं।
