पूरब से सूरज यूँ निकला
नव यौवना ने घूँघट हो खोला।
ज्यों-ज्यों चढ़ा आकाश के ऊपर
पीड़ाओं का दर्द खोला।
किरणों के संग चला में
धूप का भी साथ है,
मध्यान्ह में तो सारी सृष्टि में
मेरा ही राज हैं।
मेरे उग आने पर
उग आता सृष्टि में जीवन हैं।
बस…..
रात रूठी है मुझसे
वो मुझसे मिलने को बेकरार हैं।
क्यूँ मुझसे मिलने नही आते हो,
जगा सारी सृष्टि को,
मुझे अँधेरे में कर जाते हो।
रात और मेरा मिलन,
हो नही सकता।
मेरे आने पर अँधेरा
रह नही सकता।
बस इतनी सी बात पर
वो मुझसे रूठी हैं।
ना मेरे संग आती हैं,
ना मेरे संग रुकती हैं।
यही पीड़ा है मेरी,
यही मेरा दर्द हैं।
किरणों का तो साँझ तक साथ हैं।
पर रात मुझसे दूर हैं।
रात मुझसे दूर हैं।
गरिमा राकेश’ गर्विता’ गौत्तम
कोटा राजस्थान
