आज गर्मागर्म कोफ्तों की सुगंध आ रही थी निधि की रसोई से !
” निधि जल्दी करो मुझे देर हो रही है। ” अविनाश अपने जूते पहनते हुए बोला ।
” लाई … ” निधि फुर्ति से टिफिन लेकर होल की तरफ बढ़ी ।
अविनाश ने टिफिन लिया और बाहर चल दिया। दोनों की जिंदगी में कोई नया मोड़ नहीं था ऐसे ही फीकी फीकी सी जिंदगी थी। रौनक सिर्फ तभी होती जब बच्चे बीना और भावेश हॉस्टल से घर आते ।
लेकिन निधि के पड़ोस की वीणा जी रह नहीं पाती , सुबह हो या शाम वे तो खुशबू से मग्न हो दौड़ी आती ।
” क्या बना है आज, मैं ना सच्ची कहती हूं आप हां कहो तो मैं अभी सारा बंदोबस्त कर देती हूं। “
वीणा जी ने कोफ्ते मुंह में डालते ही मस्त होकर कहा ।निधि कुछ सकुचाते हुए बोली, ” ठीक है मैं इनसे बात करके आप को बताती हूं । “
” चलिए जैसी आपकी मर्जी मुझे तो मेरा इनाम मिल गया मैं तो चली मुझे आफिस में लेट हो रहा है। “
वीणा जी अपने हिस्से की सब्जी का बाउल लेकर चल दीं अपने घर की तरफ। निधि को ऐसा लग रहा था मानो उसकी किस्मत उससे दूर जा रही हो। एक मन कहता रोक लें और एक मन कहता अविनाश नहीं मानेंगे ।शाम को अविनाश के दफ्तर से लौटते ही निधि दरवाजे पर खड़ी मिली। उसने झट से अविनाश का बैग उसके हाथ से अपने हाथ में लिया और बोली ,
” आप फ्रेश हो जाइए मैंने आपके लिए चाय के साथ खाने को मठरी बनाई है। “अविनाश को अचंभा हुआ कि आज कुछ खातिर दारी ज्यादा हो रही है। परंतु ध्यान न देते हुए वह बाथरूम में चला गया जैसे ही बाहर निकला कि निधि तौलिया लेकर खड़ी मिली। अब अविनाश को पक्का यकीन हो गया कि निधि कुछ बात करना चाहती है।
” बोलो कुछ कहना चाहती हो ! “
अविनाश ने बिना बात को घुमाए फिराए सीधे ही पूछ लिया ।” हां… पर टेबल पर चलते हैं ना….. चाय पीते पीते बात करेंगे …” ,
निधि ने अटकते अटकते कहा ।चाय तो खत्म हो गई पर निधि तय नहीं कर पा रही थी कि कहां से शुरू करे कि तभी अविनाश ने पूछा ,
” तुम कुछ कह रही थी. .. “” हां वो… मैं कह रही थी कि… वो…. वो देखिए ना आज कल कितनी औरतें हैं जो घर भी संभाल लेती हैं और नौकरी भी करती हैं। कितनी क्षमता शील है आज की नारी ….”
बीच में ही निधि को टोकते हुए अविनाश बोल पड़ा,
” बस-बस नौकरी करने का सोचना भी मत। कितनी बार मना किया है पर तुम बार बार यही बात लेकर आ जाती हो । मुझे बिल्कुल पसंद नहीं । “” नहीं, आप ग़लत समझ रहे हैं मैं तो बस एक प्रतियोगिता में हिस्सा लेना चाहती हूं। वो पड़ोस की वीणा जी कोई कुकिंग की प्रतियोगिता के बारे में बता रही थी। “
निधि ने थोड़ा डरते हुए कहा ।” हां प्रतियोगिता की बात है तो नो प्रोब्लम्स । “
अविनाश की हां सुनकर निधि खुशी से जैसे झूम उठी और लग गई अपनी प्रतियोगिता की तैयारी में। अविनाश अपने काम में मशगूल था। उसे इतना समय कहां कि वह टेस्ट करके बताए, पर वीणा जी ने पूरा साथ दिया।
अब प्रतियोगिता का समय आ गया। निधि की आंखें दरवाजे की ओर टकटकी लगाए हुई थी और अविनाश का आना होता है। अब निधि की खुशी का ठिकाना न रहा। वह झट से अपनी स्पेशल डिश बनाने में लग गई।समय आ गया विजेता घोषित करने का
सेकंड रनरअप….
फर्स्ट रनरअप….
घड़ी की सुईयां जैसे थम सी गई हों सांस रोक कर आंखें मूंद कर निधि खड़ी थी कि तभी विजेता के रूप में उसका नाम घोषित हुआ ।
उसकी आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े। अविनाश भी खुश दिखाई पड़ रहा था ।
बीस हजार रुपए का ईनाम दिया गया जब, तो ये निधि की पहली कमाई थी जो उसने माथे पर लगा ली। इसके लिए तो वो कितना तरसी थी ।
अब भला उसकी उड़ान को कौन रोक सकता था । अविनाश ने देखा घर बैठे निधि को जगह जगह से ऑर्डर आ रहे थे तो वह भी पीछे नहीं हटा और निधि का साथ दिया, उसको प्रोत्साहन दिया। उन्होंने एक स्टार्ट अप किया जिसका नाम रखा ” निधि की रसोई से ” ।
भारत में ऐसी कई औरतें हैं जो अपना जीवन बच्चों और परिवार को समर्पित कर देती हैं और ऐसी भी हैं जो ये सब करने के साथ ही अपने पैरों पर भी खड़ी हैं। फर्क इतना है कि जब आप अपने पैरों पर खड़े होते हो तो आत्मविश्वास कमाते हैं। और इस आत्मविश्वास को जगाने के लिए अगर परिवार साथ दे तो हिम्मत बढ़ जाती है।
दोस्तों कहानी पसंद आई हो तो एक लाइक तो बनता है और यदि आप हर बार कुछ नया पढ़ने का शौक रखते हैं तो मुझे फोलो अवश्य करें जिससे मेरी नई कृति आप तक तुरंत पहुंचे ।
धन्यवाद 🙏
आपकी अपनी( Deep )

