दो नावों की सवारी

दो नावों में पैर रख, जिंदगी नही चलती

चौराहे की राहों सी चहुँ ओर a

राह है निकलती

,कहां और केसे जाएं
सही राह नजर नहीं आती,

दो नावों की सवारी से,संतुलन नही बनता

बिगड़ता जो संतुलन जरा भी,

सारा खेल बिगड़ जाता

मुंह के बल गिरते,

संभलने का मौका भी नहीं मिलता,

एक ही लक्ष्य हो जीवन का,

एक ही लक्ष्य सधे,

चूके नही निशाना जरा भी,

मीन की आंख में, सटीक निशाना लगे

एक लक्ष्य से चित्त की, एकांग्रता बढ़ती है

प्रयासरत रहते लक्ष्य प्राप्ति में,

भटकाव नही होता है।।

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