नाक पर मक्खी न बैठने देना

आज की ये पीढ़ी

अपनी राह से भटक रही है

क्रोध में सारी सीमा लांघ रही है

नाक पर अपने मक्खी तक

बैठने नही वो देते

जरा जरा सी बात पर

आपा अपना खो देते

क्रोध की ज्वाला

उनके अंदर धधकती रहती

जिस पर नाकाम याबी

आग में घी का काम करती

मार धाड़,हिंसा को अपनाते

किसी की बात सुनने

समझने को तैयार न होते

खुद को सही और

सब को गलत समझते

देर रात तक जागना,और

सुबह देर तक सोना

दखलंदाजी किसी की भी

जरा बर्दाश्त नहीं करते।

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