मुझे बड़ी पीड़ा होती है,कोई विधवा जो होती है।
कहा सहा जाता नहींहै,दर्द जीवनपर्यन्त होता है। 
जो किस्मत की लकीरें हैं,वो तो होना है होता है।
कई की उम्र गृहस्थी भी,न कुछ परिपक्व होता है।
अगर ऐसी किसी घटना में, कोई दिन कहीं आये।
मेरा तो सिर्फ ये कहना है,विधवा दोषी न कहाये।
जमाना देता जो ताना है,उसे मिल के रोका जाये।
उसका ना है क़सूर कोई, क्यों खरी खोटी सुनाये।
उसेभी जीने का हक़ है,उसे जीवनभर न तड़पायें।
उम्र हो यदि कोई ऐसी,तो जीवन उसी दर बितायें। 
वो प्राणी है उसी घर की,शगुन के काम में हक़ है।
उसे अपने बच्चों के लालन,पालन का भी हक़ है।
अगर हो उम्र काफी कम,कोई बच्चा ना जाया हो।
कोई हमसफ़र खोजें मिले,जैसे पुनर्ब्याह करवायें।
न कोई है खराबी इसमें,नया उसका घर बसाने में।
मिलेगा पुण्य भी सबको, ख़ुशी आँसू ना बहाने में।
जमाना जीने नहीं देता,विधवाओं को इज्जत से।
कई खिलवाड़ करते हैं,मिले मौका तो इज्जत से।
मैं कहता हूँ समय जो है,न रूढ़िवादी विचारों का।
रचाओ शादियां उनकी भी,विधवाओं बेचारों का।
रचयिता :
डॉ.विनय कुमार श्रीवास्तव
वरिष्ठ प्रवक्ता-पीबी कालेज,
प्रतापगढ़ सिटी,उ.प्र
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