पूछता हूँ हर बार यही सवाल,
जब भी जाता हूँ उसकी दर पर मैं,
क्या नहीं मिला तुमको मेरा प्यार,
जब भी वो मिलता है मुझको,
किसी भी राह या मंदिर में।
वो कहता है मुझसे,
कुछ भी नहीं हुआ है तेरे यार को,
सलामत है तेरा यह यार हर कहीं,
कोई नहीं पहुंचा सकता चोट, 
तेरे इस यार को सच में।
मगर मुझको नहीं होता है विश्वास,
उसकी बातों पर सच में दिल से,
उसकी चंचलता को देखकर,
उसकी शरारत को देखकर,
उसकी नादानी को देखकर।
आवाज देकर पुकारता हूँ मैं,
दीपक लेकर तलाशता हूँ मैं,
मंदिर में जाकर प्रार्थना करता हूँ मैं,
दुहा करता हूँ मैं खुदा से,
करता हूँ उसकी सलामती की फरियाद।
मगर उसको क्या शक है मुझसे मिलने में,
उसको क्या डर है दर्द मुझको सुनाने में,
फिर भी लगे नहीं दाग उस चांद पर,
उसके पवित्र शरीर – दामन पर,
लुटे नहीं उसकी अस्मत कभी ,
किसी गैर के हाथों मेरे मालिक,
या खुदा बचा लेना उसके दामन को।
शिक्षक एवं साहित्यकार-
गुरुदीन वर्मा उर्फ जी.आज़ाद
तहसील एवं जिला- बारां(राजस्थान)
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