हमारे भारतीय समाज में बहुत सी प्रथाएं है, कुछ प्रथाएं शादी, ब्याह, उत्सवी माहौल में रिश्तेदारों, परिवारों को एक दूसरे से जोड़े रखते है, जिसमें परिवार के सदस्य समाज से जुड़कर अपनी खुशियां जाहिर करते है। जन्मोत्सव धूमधाम से मनाया जाता है, तो संसार से विदा लेते इंसान की तृप्ति के लिये भी समाज को मृत्युभोज में पकवान खिलाये जाते है।
मृत्युभोज एक ऐसी कुप्रथा है, जो बरसों से हमारे समाज में चली आ रही है, ऐसे तो दहेज,सतीप्रथा एवं बालविवाह जैसी कुरीतियाँ भी समाज में व्याप्त रही है, और लाखों कोशिशों के बाद आज भी इनका अंत नहीं हो पाया है।
ये कैसी प्रथा है, जो एक शोकाकुल परिवार पर इतनी भारी पडती है, पहले ही वह परिवार अपने आत्मीय जन को खो देने के दर्द से गुजर रहा होता है,उस पर उन्हें 14 दिन तक संस्कारों को भी विधि विधान से करने की व्यवस्था करनी होती है।
स्वर्गवासी आत्मा की तृप्ति के लिये ब्राह्मणों को भोज कराना, क्षमतानुसार दान, पुण्य करना तो समझ आता है, पर इस प्रथा को कुछ इस तरह आकार दिया गया कि जब तक मृत्युभोज को बड़े स्तर पर नहीं क्रियान्वित्त नहीं किया जाये, मृत आत्मा को शांति नहीं मिल पायेगी।जो लोग सक्षम है, उनके लिये उतनी समस्या शायद न हो, पर जो गरीब है, रुपयों पैसों की कमी से जूझ रहे, पहले ही परिवार के लोगों के लिये व्यवस्था करना उनके लिये चुनौती और आर्थिक संकट से जूझ रहे ऐसे परिवार के लिये पंद्रह दिन मेहमानों की व्यवस्था करना उन्हें और अधिक अवसादग्रस्त कर देता।
घर का एक सदस्य दुनिया छोड़ कर चला जाता है उसके पीछे मेहमानों को मिठाई खिलाना कौनसा पुण्य का काम है? और ऐसे में कैसे लोग मिठाई का एक कौर भी हलक के नीचे उतार सकते है।
घर में सगाई शादी जन्म दिन या कोई भी खुशी का मौका हो, तो समझ सकते है कि मिठाई बनाकर खिलाएं और खुशी का इजहार करें, लेकिन किसी व्यक्ति के मरने पर मिठाइयां परोसी जाएं, खाई जाएं, इस शर्मनाक परम्परा को मानवता की किस श्रेणी में रखें। इस भोज के भी अलग-अलग तरीके हैं। कहीं पर यह एक ही दिन में किया जाता है। कहीं तीसरे दिन से शुरू होकर बारहवें-तेरहवें दिन तक चलता है तो कहीं ग्यारहवीं, बारहवीं और तेरहवीं तीन दिन चलता है।
और ब्राह्मणों के हाथों क्रिया करवाना आजकल आसान नहीं रहा, कई तरह के सामान और दान-दक्षिणा मिलाकर हज़ारों रुपयें लग जाते है।गांव हो या शहर कुछ परिवार इस का आयोजन बढ़ा चढ़ाकर प्रदर्शन करते है, समाज में अपनी साख क़ायम रखने के लिये, तो कुछ लाचार परिवार भी आर्थिक मंदी के दौरान क़र्ज़ लेकर इस रस्म का आयोजन करने के लिये मज़बूर हो जाते है और क़र्ज़ के बोझ में सालों दबकर रह जाते है।
बात पैसों की भी नहीं पर ये सब क्यूँ और किसके लिए? कौन स्वर्ग जाकर वहाँ क्या होता ये देखकर वापस लौटकर आया है, और किसने बताया है कि ये सब करने से ही आत्मा को मोक्ष मिलेगा।
वैसे भी शास्त्रों में मृत्यु भोज वर्जित है। महाभारत में एक प्रसंग मिलता है जिसमें कृष्ण कहते हैं कि कहीं भोजन करने तब जाएं जब भोजन करवाने वाले और भोजन करने वालों का मन प्रसन्न हो। दु:ख के समय किसी को भोजन करवाना नहीं चाहिये न भोजन करना चाहिए। जब खुद भगवान इस प्रथा का विरोध करते है तो हम इंसान क्यूँ इस प्रथा का विरोध नहीं करते। सदियों से दोहराए जा रहे है।
शैली भागवत ‘आस’
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