मुंह में राम बगल में छुरी,
इसी का अब तो ज़माना है,
मन में रखते मैल हैं पर,
तन को निर्मल दिखाना है।

अपना अपना स्वार्थ है सबका,
भलाई का समय अब पुराना है,
दुख देने में पीछे ना हटते अब,
दिखावे का मरहम बस लगाना है।

मिलते सबसे मुस्कुरा कर चाहे,
सच को चाहते अक्सर छुपाना है,
नहीं देते अब साथ अपनों का भी,
गैरों से पड़ता काम अब चलाना है।

शर्म, लाज अब गहने नहीं लोगो के
आधुनिकता कह कर बेशर्म हो जाना है,
रोके कोई जो मनमर्जी से अपनी तो,
फिर ना उसको मुंह भी लगाना है।

कहां गई वो सभ्यता हमारी अब,
कहां गया वो खूबसूरत ज़माना है,
काश लौट आए फिर अपनापन,
फिर अपनों को गले से लगाना है।

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