रघुपति राघव राजा राम पतित पावन सीताराम …. डोरबेल में बजा यह गाना जैसे ही श्रुति के कानों में पड़ा उसने गालों पर लुढ़क आएं ऑंसूओं अपने दोनों हाथों से पोंछा और थके कदमों के साथ दरवाजे की तरफ बढ़ने लगी ।
दरवाजा खोलते ही श्रृति की बेजान दिख रही ऑंखों में चमक आ गई । झट से उसके हाथ अपने मामा जी के पांव छूने के लिए झुक गए । मामा जी ने भी अपने हाथ उसके सिर पर रखकर उसे आशीर्वाद दिया ।
श्रुति अपने मामा जी से बहुत कुछ पूछना चाहती थी इसलिए घर में आए मेहमान की होनेवाली खातिरदारी को उसने झटपट पूरा किया और बैठ गई अपने मामा जी के पास ।
मामा जी ! आप तो माॅं को अच्छी तरह जानते थे । अब आप ही बताइए ना कि माॅं इस घर को छोड़कर क्यों चली गई ? क्या उन्हें हम सब का ख्याल नहीं आया ? इस उम्र में उन्होंने यह काम किया है ? जिस उम्र में पापा को उनकी सबसे ज्यादा जरूरत थी तभी वें पापा का साथ छोड़ कर चली गई ? आप नहीं जानते ! मोहल्ले में लोग कैसी – कैसी बातें कर रहे हैं । पापा को क्या-क्या सुनना पड़ रहा है और झेलना भी । आपके आने से कुछ देर पहले यें सारे सवाल मैं माॅं की तस्वीर से कर रही थी । हम सबको लगता है कि आपको जरूर मालूम होगा कि माॅं इस वक्त कहां है और किस्……… कहते कहते अचानक ही श्रृति रुक गई ।
तुम कहना क्या चाहती हो ? यूं कहते-कहते क्यों रूक गई ? इस तरह चुप न रहो । खुल कर बताओ मुझे । श्रृति के मामा जी ने उसकी तरफ देखते हुए कहा ।
मैं जो कहना चाह रही हूॅं वह आप अच्छी तरह समझ रहे हैं मामा जी लेकिन फिर भी यदि आप मुझसे पूछ रहे हैं तो मैं खुलकर बताती हूॅं कि मैं आपसे यह पूछ रही थी कि मेरी माॅं अभी कहां पर है और किसके साथ है ?
श्रुति के मामा जी कि चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान आई जो यह कह रही थी कि तुमने अपनी माॅं को आज भी नहीं समझा ।
मामा जी यह वक्त खुशियों वाला नहीं है कि आप यूं मुस्कुरा रहे हैं । वह आपकी भी बहन है और आपको भी उनकी उतनी ही परवाह होनी चाहिए जितनी की हमें हैं । श्रुति ने अपने मामा जी को मुस्कुराते हुए देख कर कहा ।
मुझे उसकी परवाह है तभी तो मैं यहां पर आया हूॅं लेकिन तुम्हारे सभी सवालों के जवाब देने से पहले एक बात बता दूं । तुम्हें यह तो दिख रहा है कि मोहल्ले में उनके बारे में कैसी – कैसी बातें हो रही है और तुम्हें अपने पिता का भी ख्याल है लेकिन तुमने अपनी माॅं के बारे में एक बार भी नहीं पूछा कि वों कैसी है ? श्रुति के मामा जी ने श्रुति से कहा ।
हम सब को लगा कि वह अपनी मर्जी से इस घर को छोड़कर गई है तो खुश ही होंगी । श्रुति के रुखेपन भरे शब्द सुनकर उसके मामा जी को यह समझने में देर नहीं लगी कि श्रुति और उसके पिता श्रृति की माॅं के इस तरह से अचानक घर छोड़कर जाने से उससे इस कदर नाराज है कि उसके स्वास्थ्य के बारे में भी पूछना उन लोगों ने मुनासिब नहीं समझा ।
कुछ विचार करने के बाद श्रुति के मामा जी ने श्रुति की तरफ देखते हुए कहा :- बेटा ! जब मेरी चुलबुली छोटी बहन इस घर में ब्याही गई थी उसकी उम्र अठारह वर्ष की थी । मैं उससे छ: साल बड़ा हूॅं । तुम्हारी दादी की तरफ से जब मेरी बहन के लिए रिश्ता गया उस समय मेरी बहन की आंखों में भविष्य के लिए अनगिनत सपने थे । उन सपनों में सबसे पहले तो उसकी पढ़ाई के सपने थे । उसकी इच्छा थी कि वह उच्च शिक्षा प्राप्त करें । मेरी बहन प्रोफेसर बनना चाहती थी लेकिन उसके सपनों भरी उड़ान को उड़ने से पहले ही अच्छे घर से आए रिश्ते ने इस तरह रोक दिया कि वह कभी उड़ ही नहीं पाई । उसने अपने पंखों को कटते हुए देखकर इसका विरोध किया था लेकिन उसे क्या मालूम था कि कुछ प्यार भरे शब्दों में ऐसी चतुराई समाई होती है जिसका तोड़ किसी के पास नहीं होता । मेरी बात हो गई है उनसे वह तुझे आगे पढ़ने देंगे । शादी के बाद भी तुम पढ़ सकती हो । उन्हें कोई एतराज नहीं है बल्कि उन्होंने तो स्वयं ही कहा है कि वही तुझे पढ़ा – लिखा कर प्रोफेसर बनाएंगे । माता-पिता की बातों को सर आंखों पर रखने वाली एक ऐसी बेटी जिसने आज तक अपने पिता का सिर कभी भी झुकने नहीं दिया था । वह अपने पिता द्वारा लड़कों वालों को दिए वचन को कैसे पूरा नहीं करती । अपनी बात हमेशा से ही बेबाकी से रखने वाली मेरी बहन के सारे सपने अग्नि के चारों तरफ लिए फेरों के साथ ही जलकर स्वाहा हो गए थे । घर पर सास का एकछत्र राज , ननदों का ताना , देवर का हंसी – मजाक के बहाने उसके करीब आने की कोशिश करना सारी बातें रोज उसके सब्र का इम्तिहान ले रही थी । एक बेटी जिसने अपने पिता द्वारा दिए गए वचनों की खातिर अपने सपनों की तिलांजलि दे दी वह बेटी अपने पिता के सिर को अपने व्यवहार के कारण किसी और के सामने कैसे झुकने दे सकती थी ? सब कुछ देखने समझने और सहने के बावजूद भी वह चुप रही । मन के किसी कोने में कभी – कभार एक आस जगती लेकिन उम्मीदों पर पानी उस समय फिर जाता जब उसका पति सबके सामने उसे खरी-खोटी सुनाता । बड़ों के चेहरे पर गर्वीली मुस्कान और छोटो के चेहरे पर आई मंद मुस्कान उसे ये एहसास दिलाती कि उस घर में उसकी कोई इज्जत नहीं है । अपने पति का गुस्सैल स्वभाव और अपने परिवार के बारे में कुछ भी ना सुनने की उसकी आदत ने कभी भी मेरी बहन को अपने पति के करीब ही नहीं आने दिया । जिस तरह खरीद कर लाई गई किसी वस्तु का उपभोग किया जाता है उसी तरह मेरी बहन भी इस घर में मात्र एक चीज बन कर रह गई थी । किसी को से कोई मतलब नहीं था । हां इतना जरूर था कि जब सबको उसकी जरूरत होती थी वह उनके पास ही मिलती थी । उसकी शादी के छः महीने बाद मुझे छुट्टी मिली थी । घर में सामान रखते ही मैं अपनी बहन से मिलने यहां आया था । रास्ते भर सोचते आया था कि मेरी बहन अपने घर में बहुत खुश होगी । ऊपर से मैं मामा बनने वाला था इस कारण मैं बहुत ही उत्सुक था अपनी बहन से मिलने के लिए । जैसे आज तुमने दरवाजा खोला है उस दिन मेरी बहन ने दरवाजा खोला था । एक पल को तो शायद उसे विश्वास ही नहीं हुआ था कि दरवाजे पर मैं खा रहा हूॅं । जब मैंने उससे उसके प्यार के नाम चुटकी से पुकारा तब जाकर उसे यकीन हुआ कि सामने मैं ही हूॅं । उसकी आंखों से झर – झर आंसू गिरने लगे और वों मुझसे लिपट गई । इस दुनिया ने तो भाई – बहन के पवित्र रिश्ते को भी अपनी नजरों से और सोच के कारण अपवित्र कर रखा है । उसकी इस हरकत पर मेरे सामने ही उसकी सास ने उसे संस्कार हीन होने का तमगा दिया था । मुझे उनकी सोच पर गुस्सा तो बहुत आया लेकिन अपनी बहन के बारे में सोच कर मैं अपनी गुस्से को पी गया । मैं उन लोगों को उनकी संकीर्ण सोच के बारे में सुना कर तो चला आता लेकिन मेरे आने के बाद मेरी बहन को बहुत कुछ सुनना पड़ता यही सोच कर मैं चुप रहा । मैंने उन्हें समझाने की कोशिश की लेकिन उन्होंने कहा कि बेहतर यही होगा कि इस बात को यहीं पर छोड़ दिया जाए और आगे से ध्यान रखा जाएं कि हमें फिर से अपनी बात दोहरानी ना पड़े । मैंने मौका देख कर अपने ऑफिस का टेलीफोन नंबर अपनी बहन को दिया और वहां से चला आया ।
उस दिन घर आने के बाद मेरी अपने पिता से बहुत लड़ाई हुई । इस घर में अपनी बहन की हालत मैं देख चुका था । इस बात को जब मैंने पिताजी से कही उन्होंने सिर्फ इतना ही कहा कि मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई । मैं नहीं जानता था कि वह परिवार ऐसा होगा । पढ़ा – लिखा और संपन्न परिवार देखकर ही मैंने अपनी बेटी उन्हें दी थी लेकिन उन्होंने उसके साथ । कहते हुए पिताजी बिस्तर पर गिर पड़े । उन्हें हार्ट अटैक आया था लेकिन शायद अपनी बेटी की दुर्दशा उन्हें और देखनी थी तभी तो ईश्वर ने उन्हें जीवनदान दे दिया था । वें भी जानते थे लेकिन फिर भी उन्होंने मुझे यह बात नहीं बताई थी । एक दिन चपरासी ने जब मुझे कहा कि आपके लिए फोन है तब मैं दौड़कर फोन के पास गया क्योंकि मैं जानता था कि मेरी बहन ने हीं मुझे फोन किया है । उस दिन घर में कोई नहीं था । सब किसी रिश्तेदार की शादी में गए थे । घर की देखभाल और काम के लिए उन्होंने मेरी बहन को वहीं पर छोड़ दिया था । मेरी बहन ने उस दिल खोल कर मुझसे बातें की । वह किसी को दोष नहीं दे रही थी । ना तो अपने मायके वालों को ही और ना ही ससुराल वालों को ही । वह तो सिर्फ इतना ही कह रही थी कि उसकी किस्मत में यही लिखा था लेकिन उसे इस बात का यकीन था कि एक दिन उसके साथ सब कुछ ठीक हो जाएगा और वह दिन बहुत जल्दी ही आएगा क्योंकि वह चाहती थी कि उसके पेट में पल रहा बच्चा बेटी पैदा लें क्योंकि उसे लगता था कि एक बेटी ही अपनी माॅं को बेहतर तरीके से जान और समझ सकती है । ईश्वर ने उसकी और कुछ बात सुनी हो या ना सुनी हो लेकिन यह बात जरूर सुन ली थी और तुम पैदा हो गई । अपने पर हो रहे सभी अत्याचारों को वह इस आस पर झेल रही थी कि उसकी बेटी उसके लिए खड़ी होगी । उसने आज तक अपनी आवाज इसलिए नहीं उठाई थी कि उसकी बेटी उसके लिए आवाज उठाएगी लेकिन एक दिन मेरी बहन की उम्मीदों के साथ – साथ मेरी उम्मीद भी टूट गई जिस दिन मेरी बहन ने बताया कि तुम भी अपने पिता , दादी और बुआ की बातों को ही सच मानकर अपनी जन्म देने वाली माॅं को ही दोषी करार दे देती हो । उस दिन के बाद से जुबान होते हुए भी मेरी बहन बेजुबान हो गई थी । घंटों भगवान श्री कृष्ण की मूर्ति के पास बैठी रोती रहती थी । याद है श्रुति तुम्हें ! जब वह एक दिन घर के मंदिर में स्थित भगवान श्री कृष्ण की मूर्ति के सामने बैठी रो रही थी तुमने उस दिन उससे क्या – क्या नहीं सुनाया था ? तुम्हारी माॅं अपनी सफाई नहीं देती थी तो सारा दोष उसी का हो जाता था । जब उम्मीदें टूटती है तो बहुत कष्ट होता है । तुम्हारे कहें हर शब्दों के साथ उसे बहुत कष्ट हो रहा था लेकिन वह उन कष्टों को किसी के साथ भी साझा नहीं कर रही थी सिवाय अपने इष्टदेव कान्हा के । बचपन में भी जब वह तुम्हें कुछ बताने की कोशिश करती थी तो तुम उसकी बात यह कहकर नहीं सुनती थी कि मां तुम्हें यह बात नहीं पता । तुम तो हमेशा ही घर में रहती हो बाहर की बातें तुम क्या जानो ? तुम्हारी यही सोच तुम्हारी उम्र के साथ बढ़ने लगी और तुम अपनी मां को अपनी जिंदगी का हिस्सा तक नहीं मानने लगी । तुमने तो एक दिन अपने पिता से यह भी कहा था कि मुझे माॅं को अपने दोस्तों से मिलवाने में शर्म आती है । उन्हें ढंग से बोलना तक नहीं आता है । क्या सोचेंगे मेरे दोस्त कि इसकी मां कैसी है ? किसी से बात भी कर सकती हैं वह । उनके मुंह में तो जुबान ही नहीं है । बेजुबान है वों ।
श्रुति के मामा जी आगे बोलने जा ही रहे थे कि बीच में श्रुति ने उन्हें टोका और कहा कि मामा जी ! यह बातें तो मैंने पापा से बिल्कुल अकेले में कही थी यह आपको कैसे मालूम ? क्या मेरी बातें माॅं ने सुन ली थी ? जो आपको उन्होंने बता दी ।
मामा जी ने फिर से वही मुस्कान अपने चेहरे पर लाते हुए कहा :- बेटा ! इस समय जरूरी यह नहीं कि मुझे यह बात किसने बताई ? इस समय जरूरी तो यह है कि तुम अपनी माॅं के बारे में सुनो । शादी के समय भी तुम्हारी विदाई से पूर्व उसने हिचकते हुए तुम्हें ससुराल संबंधी कुछ बातें बतानी चाहिए थी लेकिन तुमने उस समय भी उसका अपमान किया यह कहकर कि जिसको ससुराल में आज तक रहना तक नहीं आया वह मुझे आज यह बताने आया है कि ससुराल में मुझे रहना कैसे है ?
श्रुति आंखें फाड़ कर अपने मामा जी की बातें सुनी जा रही थी । उसे आज तक यही लग रहा था कि उसने जो भी बातें अपनी माॅं से आज तक कही है उसे कोई भी नहीं जानता है और उसका यह सोचना बिल्कुल सही भी था क्योंकि जब भी माॅं – बेटी की बात हुई थी आस पास कोई भी नहीं होता था ।
श्रुति बेटा ! आज भी तुम अपनी माॅं को गलत समझ रही हो । पूरे मोहल्ले वाले क्या कह रहे हैं यह मैं जानता हूॅं लेकिन मुझे इस बात का आश्चर्य है कि वे लोग जो सोच रहे हैं कि तुम्हारी माॅं इस उम्र में आकर भी अपने किसी प्रेमी के साथ भाग गई है ऐसी सोच तुम लोग भी रखते हो यह देख कर मुझे तुम लोगों की सोच पर तरस आ रहा है । तुम्हारी जानकारी के लिए मैं तुम्हें बता दूं कि जिसके सामने मेरी बहन की जुबान चलती थी आज वह उसी के पास है ।
यूं पहेलियां ना बुझाइएं मामा जी ! साफ-साफ बताइए कि माॅं किसके पास है ? श्रुति ने कहा ।
मैं यह कैसे भूल गया कि तुम लोगों को तो यह भी नहीं पता कि तुम्हारी माॅं किस से बात करती थी ? तुम लोगों को फुर्सत ही कहाॅं थी कि अपनी माॅं के बारे में जानकारी रख सको । उसने तो जाने से पहले अपने सारे जिम्मेदारियों का निर्वहन कर दिया लेकिन तुम लोगों ने क्या किया तुम लोगों ने तो उसे उसके मन की बात तक जानने की कोशिश नहीं की । आज तक तुम लोगों ने उसे समझा ही नहीं । जिसने उसे समझा वह उसी के साथ गई है और उसी के पास में ही हैं । शायद ! तुम लोगों को यह सुनकर दुख हो कि तुम लोगों के बिना भी आज वह बहुत खुश है । मैं उसके बारे में बताने के लिए ही यहां आया हूॅं और मैं नहीं चाहता कि तुम लोगों से गलत समझो इसीलिए जाने से पहले मैं तुम्हें यह बता देना चाहता हूॅं कि तुम्हारी माॅं वृंदावन में अपने कान्हा के साथ है और जिंदगी भर अब उन्हीं के पास रहेगी । यदि तुम्हें अपनी माॅं से मिलने का मन करें इस पते पर आ जाना । तुम्हारी मां तुम्हें मिल जाएगी लेकिन इतना याद रखना सिर्फ उसकी वहीं बेटी बन कर आना जिसकी उसने कभी अपने मन में कामना की थी । अपनी मां को समझने वाली बेटी , अपनी मां का कदम कदम पर साथ देने वाली बेटी । जिस दिन वह बेटी तुम बन जाओ उस दिन तुम अपनी मां से मिल सकती हो । कहते हुए मामा जी ने श्रुति के सिर पर हाथ रखा और तेजी से घर के बाहर निकल गए । श्रुति उनके पीछे भागी लेकिन वों तो उसकी आंखों से ओझल हो चुके थे ।
इतनी जल्दी कहां चले गए ? कहते हुए चारों तरफ श्रुति ने देखा लेकिन उसे उसके मामा जी कहीं भी दिखाई नहीं दिए । वह घर के अंदर आ गई क्योंकि बाहर बहुत धूप थी । अंदर आकर उसने दरवाजा बंद कर लिया । सोफे पर बैठने ही जा रही थी कि डोर बेल पर रघुपति राघव राजाराम पतित पावन सीताराम बजने लगा । उसने दरवाजा खोला । सामने उसके मामा जी खड़े थे ।
मामा जी ! आप इतनी तेजी से कहां चले गए थे ? मैं आपको ढूंढने बाहर तक गई थी लेकिन आप मालूम नहीं कहां चले गए थे ? श्रुति ने एक साथ में ही सारे सवाल कर डालें ।
मैं कब आया था ? मैं तो अभी आया हूॅं । मेरी गाड़ी खराब हो गई थी इस कारण मुझे आने में देर हो गई । और हां मेरी बहन का कुछ पता चला वह कहां पर है ? वैसे भी तुम लोग तो उसका पता लगाने से रहे । मुझे ही उसका पता लगाना होगा । इसी सिलसिले में मैं यहां पर आया हूॅं । मामा जी और भी बातें करते रहे लेकिन श्रुति उनकी बात कहां सुन रही थी ? वह तो यह सोच रही थी अगर मामा जी अभी आए हैं तो पिछले एक घंटे से जो मेरे साथ बातचीत कर रहे थे वह कौन थे ?
वह दौड़ कर घर के मंदिर में गई । पहले तो उसने अपनी आंखें बंद की और भगवान श्री कृष्ण से अपने सभी सवाल कह डालें । उसने अपनी आंखें खोली तो सामने भगवान श्री कृष्ण की मूर्ति की जगह पर उसे मुस्कुराते हुए मामा जी की छवि दिखाई दी । श्रुति को अपने सभी सवालों के जवाब अब मिल चुके थे ।
जब श्रुति ने यह बात अपने पिता और मामा जी को बताई तो किसी को भी उसकी बात पर यकीन नहीं हुआ लेकिन सामने रखी पर्ची जिस पर वृंदावन का पता लिखा हुआ था उसे देख कर उनके मन में यह सवाल उठ रहे थे कि कि क्या सच में ईश्वर हमें रास्ता दिखाने के लिए किसी न किसी रूप में हमारे सामने आते हैं ?
श्रुति का सिर्फ यही कहना था कि आप लोग मानो या ना मानो लेकिन मैंने अपनी आंखों से जो कुछ भी देखा है उसी को आप लोगों के समक्ष रखा है और इस पते पर यदि हम सब जाते हैं तो हमें वहां मां अवश्य मिलेगी इतना मुझे विश्वास है ।
धन्यवाद 🙏🏻🙏🏻
” गुॅंजन कमल ” 💗💞💓
