हम आकांक्षा और महत्वाकांक्षा के फेर में अक्सर फंसकर रह जाते हैं अतः आज इसके सटीक यथार्थ को समझ लेना अति आवश्यक है।देखिए जो अगम्य निजी स्वार्थ युक्त स्वप्न नर्तन करते हैं वे महत्वाकांक्षा की श्रेणी में आते हैं ऐसा मेरा मानना है वहीं जहाँ परमार्थ व सर्वार्थ का भाव जुड़कर सामान्य स्वरूप में दिखाई दे वह आकांक्षा ही कहलाती है। प्रायः या शब्द विभ्रम की स्थिति उत्पन्न कर देते हैं।
आचार्य बिनोबा भावे के अनुसार
महत्वाकांक्षा का उदय मन में होता है, तो आकांक्षा का उद्गम स्थल आत्मा है। यही वजह है कि महत्वाकांक्षा में स्वहित प्रधान होता है, तो आकांक्षा में परहित मुख्य होता है। तो क्या दोनों एक-दूसरे के विरोधाभासी हैं…?आचार्य विनोबा भावे एक बार जब आंध्र प्रदेश के गांवों में भ्रमण कर रहे थे, तो उन्होंने भूमिहीन लोगों के एक समूह के लिए जमीन मुहैया कराने की अपील की। इसके जवाब में एक जमींदार ने उन्हें एक एकड़ जमीन देने का प्रस्ताव दिया। इससे प्रभावित होकर वह गांव-गांव घूमकर भूमिहीनों के लिए भूमि का दान करने की अपील करने लगे और भूदान आंदोलन की नींव रखी। विनोबा दर्शनशास्त्री थे। उन्होंने अपने इस कार्य को आकांक्षा की संज्ञा दी। वे महत्वाकांक्षा और आकांक्षा के बीच स्पष्ट लकीर खींचते हुए कहते हैं कि आकांक्षा का उद्गम स्थल आत्मा है।आत्मा कभी भी बुरे विचार का साथ नहीं देती है, इसलिए परोपकार का भाव प्रभावी होता है। वहीं महत्वाकांक्षा का उदय मन में होता है। मन में सकारात्मक के साथ-साथ नकारात्मक विचार भी प्रतिपल जन्म लेते रहते हैं, इसलिए इसमें स्वहित प्रधान होता है। आकांक्षा और महत्वाकांक्षा दोनों ही शब्द समान अर्थ का आभास देते हैं, पर हैं वे एक-दूसरे के विरोधाभासी।महत्व दिखाने की महत्वाकांक्षा -: मैं बॉस बनना चाहता हूं…मैं सौ बीघा जमीन का कृषक…। मैं मुख्यमंत्री बनना चाहता हूं… मैं प्रधानमंत्री…। न जाने कितनी तरह की इच्छाएं लोगों के मन में जन्म लेती रहती हैं और हर व्यक्ति इसे पूर्ण करने के प्रयास में जुटा रहता है। ‘जिन इच्छाओं में अपना महत्व या रुतबा दिखाने-बढ़ाने की चाह हो, उसे महत्वाकांक्षा कहते हैं। दर्शनशास्त्री मनींद्रनाथ ठाकुर। वह कहते हैं कि अध्यात्म महत्वाकांक्षा को अच्छा नहीं मानता। आकांक्षा स्थैतिक ऊर्जा के समान है, जिसमें व्यक्ति अपनी सामान्य-सी इच्छा को पूर्ण करना चाहता है। वहीं महत्वाकांक्षा गतिज ऊर्जा के समान है, जो गतिमान होती है। व्यक्ति इसे पूरा करने के लिए कुछ भी कर सकता है। उसे सकारात्मकता या नकारात्मकता की परवाह नहीं होती है।
ज्ञान के साथ ही अज्ञान का अस्तित्व है। जहाँ प्रेम है, वहीं घृणा भी होगी। इसी प्रकार आकांक्षा और महत्वाकांक्षा की विरोधाभासी स्थितियां भी अस्तित्व में रहती हैं। एक ऐसी महत्वाकांक्षा, जिसमें व्यक्ति स्वयं के कल्याण के साथ-साथ दूसरों का कल्याण करता हुआ प्रतीत होता हो। यह सकारात्मक महत्वाकांक्षा जरूर है, लेकिन यदि इसे पूरा करने में दूसरों के विचारों का या दूसरों का भी दमन हुआ होगा, जो नकारात्मक महत्वाकांक्षा है। दोनों ही प्रकार की महत्वाकांक्षा में स्वयं की इच्छापूर्ति की भावना प्राथमिक होती है। कभी-कभार महत्वाकांक्षा भी आकांक्षा में परिवर्तित हो जाती है। यदि आप अपने कर्तव्यों का निर्वहन नि:स्वार्थ भाव से करते हैं या आपके कार्य में परोपकार का भाव छिपा है, तो यह शुद्ध आकांक्षा है। एक समय ऐसा आता है, जब आपकी आकांक्षा के सामने दूसरों की महत्वाकांक्षा गौण हो जाती है, क्योंकि इसमें दूसरों की संप्रभुता के हनन की कोशिश नहीं होती है। उनकी निजता का सम्मान किया जाता है। आकांक्षा में अहंकार की प्रवृत्ति नहीं देखी जाती है। अहंकार का अभाव होने से व्यक्तित्व में श्रेष्ठता का विकास होता है। आत्मविश्वास की वृद्धि होती है। आत्मविश्वास से भरपूर व्यक्ति सफलता के पथ पर चल पड़ता है।
अंततः यही कहना है की महत्वाकांक्षी होना या महत्वाकांक्षा रखना कोई बुराई नहीं है, बुराई है उसकी आपूर्ति के ढंग में, बुराई है उसे पूर्ण करने के लिए जिस राह का अनुगमन किया जाता है उसमें। आवश्यकता है इस स्मरणीय प्रवृत्ति को पनपाने की कि कहीं आप अपनी महत्वाकांक्षा को साकार करने के लिए सामाजिक शोषण तो नहीं कर रहे हैं,बस जिसने इस तथ्य को ध्यान में अवस्थित कर लिया वह गलत मार्ग पर कदम नहीं बढ़ा सकता। उसकी आत्मा सदैव उसे सचेत करती रहेगी। यही सामाजिक विकास के सोपान बनते हैं।
धन्यवाद!
लेखिका –
सुषमा श्रीवास्तव
