मन की आवाज को कौन सुना पाया है
जिसने भी सुनाया वो उसकी कीमत चुकाया है
दब जाती है उलझी जिंदगी में मन की आवाज
सुनाई नहीं देती न कोई सरगम न कोई साज
बस घुट घुट कर यूँ सिसकते रहते हैं
लब तक आकर भी अल्फ़ाज़ दबे रहते हैं
कभी अपनों के बीच तो कभी सपनों के बीच 
शून्य से खड़े ताकते हम सागर की लहरों के बीच….
                                        नेहा शर्मा..
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