मनमीत मेरे अब आ जाओ आंखें दर्शन की प्यासी है।
दिल ही दिल में तुम रहती हो फिर आस क्यों मेरी प्यासी है।।
दिन-रात नजर मेरी रहती है जिस राह से तेरी आस है ।
बदनाम हुई तेरे नाम से मैं पर फिर भी मैं क्यों  प्यासी हूं।
माना मैंने तुमको रब है अब रब ही मेरा साथी है।।
जीवन छोटा है आस बड़ी समझ फिर नजर क्यों मेरी प्यासी है ।
अब सांस सांस है। आस तेरी अब आ भी जा तेरी बारी है।।
स्वरचित मौलिक अप्रकाशित सर्वाधिकार सुरक्षित
डॉ आशा श्रीवास्तव जबलपुर
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