तरपैत बिलकैत भूख सँ मुदा,
आहार नै हमरा किछु भेटल…
सांझ-पराति परितै देरी,
पेट तरैप-तरैप कै सेकल…
नै जानै कोन जनमक पाप पड़ल थीक,
लोक-लाज सब बिसैर गेलैऊ…
जमन लैलौं गरीबक घर मुदा,
ठाठ-दुआर सब छुटल…
करम दुआर पर भटैक रहल छि,
पेट भरबाक लैल घर मिलैय…
अप्पन झोपड़ी पर बाँस नै कोरो,
तैं कैकरा सँ भूख मिटैय…
गरीब रहल थिक आइ नरक भेलौं,
अमीर रहितौं धरि पोथी…
माइर रहल सब लात-जुता सँ,
पेट भरल नै कोठी…
आइ गरीब बनल पाप थिका,
नै कनियौं मिलल सम्मान…
भूखक चादर लिपैट कै मरल,
तखनो धरि करैत लोक अपमान…
 ✍विकास कुमार लाभ
         मधुबनी(बिहार)
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