दिसंबर की कड़कड़ाती हुई जानलेवा सर्दी, इतना घना कोहरा कि पड़ोस में खड़े व्यक्ति का चेहरा भी स्पष्ट दिखाई ना दे।
शहर में जगह-जगह सड़क के किनारे अलाव जल रहे थे, जिनके किनारे बैठ कर गश्त पर निकले पुलिसवाले, ग़रीब और लाचार रिक्शेवाले, रात्रिसेवा पर निकले चौकीदार और गलिओं के आवारा कुत्ते ठण्ड से अपने रक्त को जमने से बचा रहे थे।
पारा खिसक के 0℃ से भी नीचे चला गया था, सड़क के किनारे खड़ी गाड़ियों से ओस की बूंदें यूँ टपक रही थी कि मानो बारिश हो रही हो।
पूरा शहर इस हाड़ कँपाने वाली सर्दी में घरों के अन्दर रजाई में दुबक के सो रहा था, जिनके पास रूम हीटर थे वो अपने-अपने बेडरूम लगा के शुकून की गर्माहट में सो रहे थे।
यक़ीन मानिये आपको अपना घर होने का मूल्य या तो मूसलाधार बारिश में या दिसम्बर-जनवरी महीने की जानलेवा सर्दी में ही पता चलता है।
अपने बेडरूम में मखमली रजाई में दुबक कर गहरी नींद में सो रहे डॉ गुप्ता को उनकी धर्मपत्नी ने लगभग रात के १ या डेढ़ बजे उठाया,
“अरे सुनिये! लग रहा है बाहर बारिश शुरू हो गयी है, टॉमी और स्वीटी (उनके पालतू कुत्ता और कुतिया, जो उनके घर की पिछले ५ सालों से रखवाली कर रहे हैं) को अन्दर कर लो, भीग जाएंगे, बाहर बहुत सर्दी है”
“अरे सो जाओ! क्यों नींद खराब कर रही हो, वैसे ही दिन भर की भागदौड़, कम से कम रात की नींद को तो हराम मत करो”
दो पैग रम के लगा कि सो रहे डॉ गुप्ता ने झल्लाते हो उनको जबाव दिया।
मिसेज गुप्ता ने भी इस कड़कड़ाती हुई सर्दी में रजाई से बाहर निकलने की ज़हमत नहीं उठाई और वो भी मुँह ढक कर सो गयी।
दोनों बेजुबान जानवर बर्फ़ीली रात में बारिश में भीगते रहे और भौंकते रहे।
उसी शहर से कुछ मील की दूरी पर एक छोटा सा गांव जो और भी ज्यादा भयानक सर्दी में सिकुड़ रहा था, गाँव में सर्दी शहरों की अपेक्षा ज्यादा रहती है।
६३ वर्षीय सुखाराम एक पतली सी रजाई में दुबका ठण्ड से सिकुड़ रहा था, इस भयानक हाड़ कंपाने वाली सर्दी में उसे नींद नहीं आ रही थी।
सुखाराम के हालात भी देश के हर तीसरे किसान जैसे ही हैं, सुखाराम ने पेट काट-काट कर अपने दोनों बेटों को अपनी बुढ़ापे की लाठी समझ कर पाला-पोसा और पढ़ाया-लिखाया, जब सुखाराम को उनकी जरूरत थी तब उसके दोनों बेटे पैसा कमाने बीवी और बच्चों के साथ दिल्ली चले गए।
पिछले महीने सुखाराम ने अपनी जीवनसंगिनी लता को खो दिया, लता ने हर विषम परिस्थिति में सुखाराम का पूरा साथ दिया था, उसके किसी बेटे ने सुखाराम को अपने साथ चलने को नहीं बोला, उसके दोनों बेटे लता के अंतिम संस्कार कर अगले दिन ही दिल्ली चले गए।
अब परिवार के नाम पर सुखाराम के पास उसके ही जैसे दो मरियल बैल और लता की प्रिय गाय गौरी ही बची थी।
जो कुछ ज़मीन थी, वो दोनों बेटों ने आधी-आधी बंटवाने के बाद बेच दी और दिल्ली में ही प्लॉट ले लिया।
घर के नाम पर एक कच्चा कमरा और कमरे के बाहर टूटा हुआ छप्पर, कभी ये एक कमरा और छप्पर सुखाराम और लता के लिए किसी महल से कम नहीं था, वो पहली बार लता को विदा कर इसी कच्चे कमरे में लाया था, दोनों ने आपसी सामंजस्य से एक ऐसा सुखमय दाम्पत्य जीवन जिया, जिसमें ना कोई शिकायत थी और ना कोई ख्वाहिश।
लता के जाने के बाद सुखाराम को अपना जीवन बोझ सा लगने लगा था, अब वो जो कुछ भी बना लेता, चुपचाप खा लेता, नहीं तो कभी-कभी खाली पानी पी कर ही सो जाता था, ख़ून के रिश्तों ने उसे पूरी तरह से उपेक्षित कर दिया था।
आज भी वो सिर्फ पानी पी कर लेटा था, उसने जिंदगी में ख़ून-पसीना बहाकर जो कुछ भी अर्जित किया वो सब लता के हाथ पर रख दिया, लता भी इतनी ईमानदार थी कि वो खुद फटी साड़ी पहनकर कर अपने बेटों के लिए नई-नई ख़ुशियाँ सिलती रहती, आज उसके बेटों के पास इतनी फुरसत भी ना थी कि मृत्यु के बाद के संस्कारों में भी आ सकें।
अचानक से बारिश की बूंदों ने सुखाराम को स्मृतिओं के के सुंदर संसार से निकाल कर यथार्थ के स्वार्थी संसार में ला के बिठा दिया।
ग़रीब सुखाराम के घर में बारिश से बचने के लिए कोई छाता भी नहीं था, बरसात के मौसम में वो कभी बोरी या पॉलीथीन वगैरह को ओढ़ कर खुद को भीगने से बचा लेता था।
सुखाराम तुरन्त उठकर भागा और अपने दोनों बैलों और अपनी गाय को छप्पर में ले जाकर बांध दिया, बारिश थोड़ी सी और तेज हो गयी थी, सुखाराम के कपड़े भी हल्के से गीले हो गए थे।
सुखाराम जल्दी-जल्दी में अपना बिस्तर समेटना भूल गया, जो अब बारिश में पूरी तरह भीग चुका, सुखाराम के पास एक ही रजाई और गद्दा था।
सर्दी के कारण सुखाराम के दांत बजने शुरू हो गए, उसने कमरे के अन्दर जाकर बक्से से लता की पुरानी सॉल निकाल ली, उसने देखा कि लता की सॉल में कई छेद हो रखे थे, जिनको देखकर सुखाराम का हृदय छलनी-छलनी हो गया, उसने सॉल को ओढ़ लिया मानो आज वो सॉल में समा जाना चाहता हो।
सॉल से आ रही लता के शरीर के महक उसे दूसरी दुनियां में ले जाने लगी।
अगली सुबह डॉ गुप्ता के घर में दरवाजे के पास उनके पालतू कुत्ता और कुतिया दोनों पूरी रात भीगते हुए ठण्ड से मरे पड़े थे।
दूर गांव में सुखाराम ने लता की सॉल में लिपटे हुए अपने नश्वर शरीर को त्याग दिया था।
हल्की-हल्की बारिश फिर से शुरू हो गयी, शायद आज मानवता सिसक-सिसक के आँसूं बहा रही थी।
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रचनाकार – अवनेश कुमार गोस्वामी
