🌹जिम्मदारी कौन है
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किसी भी देश का अपना इतिहास होता है, परम्परा होती है। यदि देश को शरीर माने तो संस्कृति उसकी आत्मा है। किसी भी संस्कृति में आदर्श होते हैं, मूल्य होते हैं। इन मूल्यों की संवाहक संस्कृति होती है। भारतीय संस्कृति में चार मूल्य प्रमुख हैं— धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। यह बात अलग है कि पाश्चात्य संस्कृति में अर्थ और काम की प्रमुखता है। सादा जीवन उच्च विचार हमारी संस्कृति की परम्परा समझी जाती थी परन्तु आधुनिकता की अंधी दौड़ एवं पाश्चात्य संस्कृति का जीवन में प्रवेश होने से वह परिभाषा कहां चली गई पता ही नहीं । आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज द्वारा रचित मूकमाटी महाकाव्य में वह परिभाषा हमें मिलती हैं—
इस युग के दो मानव अपने को खोना चाहते हैं एक भोग रोग मद्यपान को चुनता है और एक योग त्याग आत्मध्यान को धुनता है। कुछ ही क्षणों में दोनों होते विकल्पों से मुक्त फिर क्या कहना एक शव के समान निरा पड़ा है और एक शिव के समान खरा उतरा है।
सच यही है वे दोनों संस्कृतियां जिनमें से हमें क्या चुनना है यह हमारे ऊपर निर्भर है। वर्तमान में सामाजिक बदलाव को देखकर ऐसा लगने लगा है कि जैसे न ही हमारी संस्कृति रह गई है न ही हमारी सभ्यता। जहाँ तक सवाल है पश्चिमी सभ्यता का तो हम लोगों ने उन बातों को अपनाया जो भारतीय संस्कृति के प्रतिकूल थीं। जिस भारतीय समाज में हम रहते हैं वहां का वातावरण, सभ्यताएं, मर्यादाएं नैतिक मूल्य कुछ और ही हैं। ऐसे में जब हम पहनावे में उसकी खुली सोच और खुलेपन का अंधानुकरण करते हैं तो हमारे वातावरण में नग्नता दिखाई देती है।
हवा में अजीब सी गंदगी घुल गई है मानव मस्तिष्क पर विपरीत असर कर रही है बात मैं हवा की नहीं कर रही हूँ । मैं हवा के माध्यम से हमारे चारों ओर के सामाजिक परिवेश की चर्चा कर रही हूँ । पाश्चात्य से बटोरा है हमने काम—ग्रसित समाज जिसने हमारी भावनाओं को काम के वशिभूत किया है लिया है हमने पाश्चात्य से अतिमहत्वकांक्षी होने का मन्त्र जिसने हमे हमारे सामाजिक परिवेश में अनुशासनहीन जीवन जीने की ओर अग्रसर किया है जाना है हमे पाश्चात्य से न्यूक्लियर युक्त समाज मे जीवन जीने का तंत्र इस मंत्र ने मानव सभ्यता को इसके अंत पर लाकर खड़ा किया है पाश्चात्य से हम ने सीखा है बर्णसंकर युक्त नई पीढ़ी के साथ जीवन जीने का मार्ग,यह मार्ग बड़ा आसान है हमारे भारत धर्म भारतीय की संस्कृति को अधोगती में ले जाने के लिए चाहिए तो था हम बटोरते कुछ ऐसा पाश्चात्य संस्कृति से जो उसे हम से कुछ मायनो में आदर्श बनाती है जैसे कि हम उनकी ही तरह ईमानदार होते है,राष्ट के प्रति समप्रति होते है राष्ट प्रेमी होते है, अनुशासित होते जो हमे सम्पूर्ण मानव बनने में सहायता होती है,हम एक आदर्श भारतीय समाज का निर्माण कर पाते हम आसमान पर चमकते न कि भष्टचार बलात्कार,अपराध की सूची मे सबसे ऊपर होते।
कम से कम कपड़े पहन अधिक से अधिक सरीर का पर्दशन करना यदि मार्डन है तो आदिवासी ज्यादा मार्डन और सभ्य हुए संस्कृति का उछेस्य मानव जीवन को सुंदर बनाना है परन्तु पाश्चात्य संस्कृति में चमकते कांच झिलमिलाती रोशनी शराब का प्याला और साथ मे खड़ी अर्धनग्न लड़की उद्देस्य होता है ऐसे लगता है टेलीविजन में दिखाए जाने वाले सिनेमा सिरियल विज्ञपन में अर्धनग्न महिलाओ को देखिए जाने की अनुमति है आइटम गर्ल और आइटम संग के बिना कोई फ़िल्म बक्स ऑफिस में हिट नही होती पहनावे में भदाकाउपन और खुलेपन की सोच के करण स्त्री देवी के स्थान पर भोग्य बन गयी है जहां पहले रिस्तो की अहिमियात थी सदिया पूरी जिंदगी चलती थी आज कल रिस्ते चिप्स के पैकेट की तरह हो गए खा कर फैक दिए अवैद्य सबंधो की बाढ़ आगई है इस कारण अपराध की रोज बढ़ोतरी हो रही है इन विचारों ने लोगो को कितनी आजाद किया ये वही जाने पर मैं यह जनता हु की धर्म और देश विध्वंस की ओर जा रहा है यदि आपना असितत्व बनाए रखना है तो इसाधुनिकता और वास्तविकता अधुनिकता के बीच आंतर समझना होगा अधुनिकता के नाम पर हमारे संस्कृति को नष्ट करने का प्रयास किया जा रहा है।
आज साड़ी को गरिमामय मने तो लोगो का कहना है पेट आधा क्यू खुला है क्या आधुनिक ब्लाउज है आदि आदि में कहता हूं गंदगी लोगो के दिमाग मे होती है जिसके पास संस्कार है उसे सोभनिय और अशोभनिय का खयाल रहता है और जिसके पास संस्कार ना हो लज्जा ना हो, तो उससे क्या उम्मीद रखना वैसे गंदे लोग अछी बातों में भी गंदगी ढूढ़ने का प्रयास ही करते है।
अक्सर लोगो का जुबानी पर होता है कि महिलाएं पश्चिम का अंधानुकरण कर रही है क्या पश्चिम काकोई भी दुष्प्रभाव पुरषो पर नही होता,बात स्त्री और पुरुष को वर्गीकृत करने के लिए नही है जो भी मर्यादा के बाहर जाएगा वह दोसी है पुरुष की बात करे तो उनकी सोच है ,,,,जिन कपड़ो में कोई दीगर लड़की लगती है बड़ी कामुक,,,घर पहुचकर उनकी सोच बदल जाता है तब वे कहते है छलकता है भोला बचपन ,जब पहनती है मेरे सोलह बरस की बच्ची।
वाह क्या बात है भूल जाते है वे कि सुविधा की दृष्टि से धोती छोड कर फुलपन्ट अपनाई थी पर महिला उन्हें हमेशा भारतीय परिधान में देखनी चाहिए
लज्जा स्त्रियों का आभूषण है तो क्या पुरुषो को निर्लज्ज होना चाहिए जगह जगह लौ लूप दृष्टि वाले अमयरदित ब्यक्ति दिख जाएंगे जो बलात्कार छेड़खानी जैसे घटनाओ को अन्जाम देते है।
हमारा दुर्भाग्य है कि हमने पहनावे में नकल कर ली पर अपनी अक्ल विकसीत नही कर पाए फैसन के दुष्टप्रभाव पुरुष व स्त्री दोनों में समान रूप से है पहनावे में स्वतन्त्रता जरूरी है पर फूहड़पन नही इस लिए यही संदेस देना चाहूंगा कि भारतीय संस्कृति के लिए दुःशासन मत बनो सभ्य कपड़े पहनो वरना आने वाला समय मे बेटी को पालना मुश्किल हो जाएगा जिस समाज मे नारी सुरक्षित नही है वह समाज नही जंगल है और उसमें रहने वाले लोग जानवर, हम बदलाव की अंधी में बहकर इतनी दूर ना निकल जाए कि अपनी ही धरोहर को खो बैठे और आपने ही पास आपने बच्चो को देने के लिए कुछ सेष ना रह जाये।
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,स्वरचित
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,प्रितम वर्मा,,,,,
