उत्तर प्रदेश के कानपुर देहात में बसा एक छोटा सा गांव गोविंदपुर, गांव की आबादी लगभग २००० -२२०० लोगों के आसपास की होगी।
यूँ तो गोविंदपुर में कई सारी जाति के लोग रहते हैं, पुराने लोग बताते चले आये हैं कि गोविंदपुर को गोविंद पाण्डेय नाम के एक पंडित ने लगभग ३५० -४०० साल पहले बसाया था, गोविंद पाण्डेय उस समय के बहुत ही प्रकांड और प्रसिद्ध ब्राह्मण थे, उनके पास वेदों और शास्त्रों का असीमित ज्ञान था, उनके ही नाम पर इस गांव का नाम गोविंदपुर पड़ गया।
कई साल हो गए गोविंदपुर गांव ने कई पीढ़ियों को उठते, गिरते, संभलते और गाँव से निर्वासित हुए देखा है।
जिन पाण्डेय ब्राह्मणों ने गोविंदपुर गाँव की नींव रखी थी, उनमें से ज्यादातर गांव से निर्वासित होकर कानपुर या लखनऊ में जाकर बस गए, अब मुश्किल से एक या दो पाण्डेय परिवार ही गोविंदपुर गाँव में बचे हैं, जिनकी भी माली हालत बहुत अच्छी नहीं है।
इसी प्राचीन पाण्डेय परिवार से संबंध रखने वाले गांव में बेहद गरीब ब्राह्मण गोविंद भी रहते हैं, जिनके पिता ने अपने पूर्वजों की याद में इनका नाम भी गोविंद पाण्डेय रख दिया था, समय कैसे कैसे रंग दिखाता है इसका बहुत बड़ा उदाहरण इस गांव के पाण्डेय ब्राह्मण परिवार है, जो कभी इस गांव के जमीदार हुआ करते थे आज वही सब मेहनत मजदूरी करके गुजर बसर करने के लिए मजबूर हैं।
गोविंदपुर में बाहर से आकर बहुत सारी जातियों के लोग बस गए, जो आज बहुत ही संपन्नता के साथ जीवन निर्वाह कर रहे हैं।
गोविंद के पिता श्याम मोहन पाण्डेय बहुत ही प्रसिद्ध पंडित थे, पंडिताई के साथ-साथ कथावाचक भी थे, उनका इस पूरे क्षेत्र में बहुत सम्मान था।
लेकिन बहुत ही कम उम्र में जब गोविंद मात्र १४-१५ साल का था, उस समय उसके पिता का आकस्मिक निधन हो गया और समय ने गोविंद को गरीबी लाचारी के दलदल में धकेल दिया।
गोविंद पाण्डेय के पास जायदाद के नाम पर मात्र ५ बीघा पुश्तैनी जमीन है, दो कमरों का पुराना घर है, उनका घर भी लगभग जर्जर हालत में है।
गोविंद पांडेय के परिवार में उनके अलावा उनकी बूढ़ी माँ, उनकी धर्मपत्नी आशा, उनके दो बेटे राहुल और रोहित और सबसे छोटी बेटी रेनू है, उनके तीनों बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं, बड़ा बेटा राहुल पढ़ाई के साथ जॉब की भी तैयारी कर रहा है।
दो कमरों के घर में इतने बड़े परिवार का गुजारा बहुत ही मुश्किल से होता है, इसलिये गोविंद अपना बिस्तर घर के आँगन में ही लगा लेते हैं, बरसात का मौसम तो उनके पूरे परिवार के लिए किसी यातना से कम नहीं था, भला हो उनकी धर्मपत्नी आशा का जो समय-समय पर घर की मरम्मत और रंग बग़ैरह खुद ही करती रहती हैं नहीं उस घर ने उन्हें कब का बेघर कर दिया होता।
दिन रात खुद को काम में खपा देने वाले गोविंद के कंधों पर किशोरावस्था में ही पिता के गुजर जाने के बाद घर की सारी जिम्मेदारी आ गयीं, घर की माली हालत शुरू से ही अच्छी नहीं थी, पिता का लिया हुआ पुराना कर्ज़, दो छोटी बहनों की शादी, खुद की शादी और अपनी बूढ़ी माँ की इलाज और देखभाल ने गोविंद को स्कूल छोड़ने पर मजबूर कर दिया।
जिम्मेदारियों ने गोविंद को उम्र से पहले बूढ़ा कर दिया था, घर में गुजारे के लिए गोविंद ने दो गाय पाल रखी थी, बस चाय वगैरह के दूध को निकाल कर आशा बचा हुआ दूध बेच देती है, जिससे बच्चों की पढ़ाई का ख़र्च और घर का राशन वगैरह का खर्च चलता रहता था।
गोविंद का पूरा दिन गायों की देखभाल, चारा-पानी करने में, बाकी का समय खेतों की देखभाल में निकल जाता था, गोविंद सुबह ४:०० बजे उठ कर दैनिक दिनचर्या में लग जाते हैं जिसको खत्म होते-होते रात के ८:०० बज जाते हैं।
गोविंद पाण्डेय का बड़ा बेटा राहुल लगभग दो-तीन घंटे से लकड़ी की कुर्सी बैठा, मेज पर  पड़े उस कॉल लेटर को बार बार देखे जा रहा था जो आज ही उसे डाकिया देकर गया था।
राहुल पिछले ३ सालों से वह लगातार प्रतियोगी परीक्षाओं को दे रहा था लेकिन अभी तक कहीं से भी उसके लिए सुखद समाचार नहीं आया था, आई बी के इस एग्जाम का सेन्टर भोपाल में था, राहुल को घर की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छे से पता थी।
अपने पिता की दयनीय हालत देखकर राहुल मन ही मन दुखी सा रहता था, आई बी का फॉर्म उंसने २ महीने पहले डाला था, जिस की परीक्षा की तारीख इसी महीने थी, उसने एग्ज़ाम के बारे में अपनी माँ को बताया, उसकी माँ सुनकर बहुत खुशी हुई,
“शाम होने को आई तेरे बाबूजी आते ही होंगे मैं उनके लिए चाय बनाने रख देती हूँ”
रोहित ने अपनी मां की आंखों में उस लाचारी और मजबूरी को पढ़ लिया था जो वह उससे कह नहीं सकीं, राहुल ने पिछले साल स्नातक की परीक्षा प्रथम श्रेणी से पास की थी। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी उसने स्कूल के समय से ही शुरू कर दी थी, राहुल को विश्वास था कि एक दिन वह अपने माँ-बाप का नाम जरूर रोशन करेगा।
गायों को चारा डालकर गोविंद ने हाथ मुंह धो कर, घर में प्रवेश किया, आंगन में पड़ी चारपाई पर बैठ गए,  कुछ ही देर बाद उनकी धर्मपत्नी ने चाय का गिलास उनके हाथ में ला के रख दे दिया 
“लो चाय पी लो, आज तो बाहर मौसम बहुत ठंडा है”
राहुल हाथ में एग्जाम का एड्मिट कार्ड पकड़े दरवाजे के पास खड़ा अपने पिता को संकोच भरी नजरों से देख रहा था।
“अरे कब तक ऐसे ही खड़ा रहेगा, आकर बात करले ना, जाना तो पड़ेगा ही ना, घर में ही बैठा-बैठा क्या करेगा, क्या पता कल कुछ अच्छा ही हो जाए”
माँ थोड़ा डांटते हुए उसका हौसला बढ़ाया।
“क्या बात है, क्या हुआ, अरे इधर आ कर बताओ क्या हुआ”
“पापा वो भोपाल से आई बी एग्जाम के लिए एड्मिट कार्ड आया है, ५ दिन बाद परीक्षा है”
कहते कहते राहुल चुप हो गया।
तुम्हारी तैयारी तो ठीक है ना, २ साल से तो कुछ हो नहीं रहा है, देख ले, नहीं तो गांव में ही बच्चों को ट्यूशन वगैरह देना शुरू कर दो, मैं यादव जी के स्कूल में भी बात कर लूंगा,  १००० – १२०० रुपए तो महीने पर मिल ही जाएंगे, घर में खाली बैठने से अच्छा रहेगा”
चाय पीते हुए गोविंद ने राहुल को समझाते हुए कहा।
“नहीं पापा मुझे कुछ करना मैं गांव में रहकर अपना जीवन बर्बाद नहीं कर सकता”
“ठीक है जैसी तुम्हारी मर्जी, कब जाना है तुमको”
“पापा ३ दिन बाद निकलना पड़ेगा”
“ठीक है टिकट कब लेनी है”
“पापा जनरल टिकट स्टेशन पर ले लूंगा”
गोविंद ने जल्दी-जल्दी चाय खत्म की और कंधे पर अपना मैला सा अंगौछा डालकर घर से बाहर निकल गए,
गोविंद पाण्डेय की जेब में इस समय मात्र ₹ ४५ पड़े हुए थे,
गोविंद को आज अपनी मजबूरी और लाचारी पर रोना आ रहा था, गोविंद ने कुछ सोचते हुए सड़क के किनारे के दूसरे मोहल्ले के मास्टर रामप्रकाश के घर की तरफ रुख़ कर लिया।
इस समय गोविंद के चेहरे पर लज्जा, संकोच और  मजबूरी के अनगिनत भाव थे लेकिन संतान के उज्जवल भविष्य के लिए उन्होंने अपने आत्मसम्मान को दबा के रख दिया।
गोविंद रामप्रकाश के घर के दरवाजे के पास जाकर खड़े हो गए, उन्होंने धीमे से आवाज लगाई,
“मास्साब घर पर हैं क्या”
“हाँ गोविंद, घर में ही हूँ, बैठक में आ जा”
गोविंद के अपने फ़टे हुए गन्दे जूते दरवाजे के बाहर ही उतार दिए, वह बहुत संकोच में डूबा हुआ मास्टर रामप्रकाश की बैठक के अंदर गया, सामने मास्टर रामप्रकाश कुर्सी पर बैठकर कुछ हिसाब लगा रहे थे, 
गोविंद दरवाजे के पास जमीन पर बैठ गया।
यूँ तो बैठक में ३-४ कुर्सियां भी पड़ी हुई थीं लेकिन न तो रामप्रकाश ने गोविंद को कुर्सी पर बैठने को बोला और ना ही गोविंद की हिम्मत कुर्सी पर बैठने की हुई।
सामने गोविंद को जमीन पर बैठा देख मास्टर रामप्रकाश के चेहरे पर गर्वान्वित होने वाले लक्षण आ गए।
“हाँ गोविंद, कैसे आना हुआ,  कुछ काम था क्या, बिना काम के तो तू कभी आता भी नहीं है, ना कोई दुआ-सलाम, तू तो अब बड़ा आदमी हो गया है, बता कैसे आना हुआ”
किसी से पैसा मांगना कितना मुश्किल होता है, ये वही व्यक्ति समझ सकता है जिसने कभी मजबूरी में किसी दूसरे से उधारी मांगी हो गोविंद भी उस समय मारे संकोच के रामप्रकाश के आगे हाथ जोड़कर बोला,
“मास्साब कुछ रुपयों की जरूरत थी”
“देख गोविंद तू तो पहले से ही ₹ ५००० रख के बैठा है, ब्याज भी टाइम से नहीं देता है, बताने भी नहीं आता है कि कब हिसाब चुकता करेगा, तेरी धान भी की फसल भी बिक गयी लेकिन अभी तक तूने ₹ ५००० वापस नहीं किए, उसके बाद फिर तू दोबारा रुपये मांगने आ गया, देख भाई मैंने कोई धर्मशाला तो खोल नहीं रखी है कि तू जब मुँह उठा कर चला आ,  मैं ब्याज पर पैसा देता हूँ, मुझे टाइम पर ब्याज चाहिए, वह तो तू देता नहीं है , ना भाई ना  मैं ना दे रहा तुझे पैसे”
गोविंद की आँखों में अपनी लाचारी और मज़बूरी हल्के से आँसूंओं के रूप में आके टिमटिमाने लगी,अपने आंसुओं को छुपा के बनावटी हंसी को चेहरे पर लाकर बोला
“नहीं मास्साब, मैं कुछ भी करके इस फसल में जरूर चुका दूँगा, अभी बहुत जरूरत है केवल ₹ ५०००  दे दो ब्याज लेट नहीं होने दूँगा, मैं पुराना ₹ ५००० भी इस बार में पूरा चुकता कर दूँगा”
“देख गोविंद तेरी जुबान पर पैसे दे रहा हूँ, सोच ले फिर मैं बहुत बदतमीज आदमी हूँ, तूने अगर टाइम पर पैसा नहीं लौटाया तो मुझसे बुरा और कोई नहीं होगा”
रामप्रकाश ने गोविंद को धमकी देते हुए ₹ ५००० उसकी तरफ फेंक दिए।
गोविंद ने हाथ जोड़कर रामप्रकाश को धन्यवाद बोला और पैसे उठा कर घर की ओर चल दिया, आज यह पैसे उसे मानो किसी खजाने से कम नहीं लग रहे थे।
“ये पंडित क्यों आया था, फिर पैसे ही माँगने के लिए ही आया होगा”
रामप्रकाश की पत्नी ने अपने पति से पूँछा।
“देख रमा, जब भी इन ऊँची जाति वालों को अपने आगे हाथ फैलाये और सामने नीचे जमीन पर बैठा हुआ देखता हूँ तो एक अलग सी शाँति मिलती है, ऐसा लगता है कि जैसे मेरे ज़ख्मों पर कोई मरहम लगा रहा हो”
“बचपन में जब बाबू जी को इन सबके पैरों के नीचे बैठा हुआ देखता था, पैर छूते हुए, माँ को इनके घरों की सफाई, लिपाई, पुताई करते देख मेरा दिल रो जाता था”
“हमारी जाति की औरतों और लड़कियों की इज्ज़त के साथ आये दिन खिलबाड़ होता रहता था, आज तू देख समय का खेल, जो कभी राजा थे, आज वो कल के रंक के घर भीख माँगने आते हैं”
कहते हुए रामप्रकाश ने बाबा साहेब की कमरे में रखी हुई फ़ोटो को कृतघ्नता भरी नजरों से देखा।
ये कर्ज ही सही लेकिन थे तो अब आख़िर ये गोविंद के अपने पैसे।
गोविंद घर आकर खाना खाया, उन्होंने आपस में बातें की, लेकिन रामप्रकाश से पैसे उधार लेने वाली बात को उंसने किसी को नहीं बताया, राहुल जो काफी समय से गुमसुम बैठा हुआ था, सोच रहा था कि वह परसों भोपाल कैसे जा पायेगा।
गोविंद की धर्मपत्नी आशा भी सोच रहीं थी कि गोविंद कैसे राहुल को भोपाल भेज पाएगा।
गोविंद इन सब बातों से परे आँगन में पड़ी अपनी चारपाई पर पिछले वर्षों में हुए सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन के बारे में सोच रहा था, जिस गांव में लोग उसके सम्मान में कभी चारपाई से उठकर खड़े हो जाते थे, आज उसी गाँव में उसे चारपाई पर भी बैठने का अधिकार नहीं है।
आज जिस मास्टर रामप्रकाश के घर जमीन पर बैठ के गोविंद पैसे माँग के लाया था, कभी रामप्रकाश के पिता को गोविंद के पिता ने अपने घर पर रख पर पाला था।
क्या सच में समाज से जातिप्रथा चली गयी ?
या उंसने सिर्फ अपना स्वरूप बदल लिया ?
जिन लोगों को उनके पूर्वजों ने बाहर से लाकर जिस गांव में बसाया था, आज उन्हीं के द्वारा जलील होना गोविंद को बहुत दुखी कर रहा था।
लेकिन आदमी को वो ही मिलता है जो उसके भाग्य में, भाग्य कभी बदल सकता है, समय- चक्र चलता रहता है, जिसमें सिर्फ चेहरे बदलते हैं जो जातिवाद प्राचीन काल में सवर्णों के द्वारा फैलाया गया था आज वही जातिवाद अन्य जातियों द्वारा फैलाया जा रहा है।
आदमी क्या कुछ नहीं सहता है सिर्फ रोटी, कपड़ा और मकान की चाह में।
रचनाकार – अवनेश कुमार गोस्वामी
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