वार्डबॉय , देअर इज़ एन इमरजेंसी, हरी अप,कम फास्ट – डॉक्टर साहब ने आवाज़ लगाई l चंद सेकंड में एक नर्स और दो वार्ड बॉय डॉक्टर साहब के  बगल से होते हुए शरद को ऑपरेशन थिएटर के अंदर ले गए l डॉक्टर साहब ने रिसेप्शनिस्ट को शरद के घरवालों को इन्फॉर्म कर हॉस्पिटल बुलाने के लिए कहा और ऑपरेशन थिएटर के अंदर चले गए l
 पलक झपकते ही सब घर वाले अस्पताल पहुँच गए l एक्सीडेंट इतना बड़ा था कि बाहर से सीनियर डॉक्टर को बुलाना पड़ा l डॉक्टर को देखते ही शरद की माँ ने कहा – डॉक्टर साहब, मेरा बेटा शरद बच तो जाएगा ना l डॉक्टर साहब ने शरद की माँ के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा – अभी कुछ कहा नहीं जा सकता, माँ जी l भगवान पर भरोसा रखिए, बस l
थोड़ी देर में, जब ऑपरेशन थिएटर की बत्ती बुझी और डॉक्टर बाहर आए, तो उन्होंने  बताया कि एक्सीडेंट कि वजह से शरद की कमर का निचला हिस्सा पैरालाइज हो गया है l वह बिना किसी सहारे के अब शायद ही चल पाए l
 अपने इकलौते बेटे की स्थिति के बारे में सुनकर परिवार के सभी सदस्यों के पैरों तले ज़मीन खिसक गई परंतु होनी को कौन टाल सकता है l
पिता ने डॉक्टर साहब से शरद की देखभाल के लिए 24 घंटे एक नर्स के इंतजाम करने की प्रार्थना की l उनकी स्थिति को समझते हुए l डॉक्टर ने उनके कहे अनुसार, शरद की देखभाल के लिए एक नर्स तैनात कर दी l जब डॉक्टर साहब ने नर्स को शरद की माँ से मिलवाया तो उनका चेहरा देखने लायक था l पिता ने कारण पूछा तो माँ ने बताया कि ये वहीं रुचिरा है !
जिसका रिश्ता दो साल पहले शरद के लिए आया था l शरद को भी रुचिरा की फोटो बहुत पसंद आई थी परंतु जब वह मिलकर आया तो उसकी हाँ ना में बदल गई फिर मैंने भी ज्यादा पूछा नहीं l
अगले दिन,जब शरद की आँखें खुली तो उसने अपने आप को अस्पताल में पाया l माँ पास ही बैठी थी और उसके सिर पर हाथ फेर रही थी l हाथ फेरते फेरते माँ ने पूछा – अब कैसा महसूस कर रहे हो, बेटा l जवाब में शरद ने मुस्कुरा दिया l
धीरे-धीरे शरद को अपनी स्थिति का ज्ञान हो गया था और वह भीतर से बिल्कुल टूटा हुआ महसूस करने लगा परन्तु रुचिरा ने उसके मनोबल को टूटने नहीं दिया l
वह रोज़ उसे रिहैब सेंटर ले जाती और इस बात का पूरा ध्यान रखती कि शरद समय पर खाना खाए और सारे व्यायाम करें l
धीरे-धीरे शरद की हालत संभलने लगी l उसे यकीन हो चला था कि वह दोबारा चल सकता है l रुचिरा के सहयोग और अपने परिश्रम से वह कुछ ही महीनों में पुन: पहले की तरह चलने लगा l
आज पूरे सात महीने बाद शरद को हॉस्पिटल से छुट्टी मिलने वाली थी और वह बेसब्री से रुचिरा का इंतजार कर रहा था l वह चाहता था कि वह रुचिरा से अपने उस दिन के व्यवहार के लिए माफी माँगे और उससे कहे कि उससे शादी के लिए मना करके उसने जीवन में सबसे बड़ी गलती की l
आज वह अपनी गलती स्वीकारना चाहता था l इतने में कमरे का दरवाज़ा खुला और शरद ने उत्सुकता से दरवाज़े की ओर देखा l
 आज रुचिरा नहीं आएगी – एक नर्स ने कहा l
 क्यों नहीं आएगी – शरद ने पूछा
आज उसकी शादी है – नर्स ने जवाब दिया l
यह सुनकर शरद लड़खड़ा गया और सहारा लेकर कुर्सी पर बैठ गया l उसकी आँखों में आँसू थे l विचित्र खेल है भाग्य का भी l उसे याद है, आज भी वहीं मुलाकात जिसमें रुचिरा ने उससे कहा था l वह आगे पढ़ना चाहती है, अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती है l वह नौकरी करने के साथ-साथ घर भी संभाल सकती है l
और जवाब में शरद ने कहा था – आई एम सॉरी, आई डोंट वांट वर्किंग वूमेन इन माय लाइफ l
आई वांट ए हाउसवाइफ l
और रुचिरा को वही कुर्सी पर रोता हुआ छोड़कर वह कार में तेज़ी से बैठकर आगे बढ़ गया था l
 स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
सुनीता कुमारी अहरी
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