“कैसे  प्रेम दिवस मनाए हम जब आँखों में पानी हो।
सैना के शोणित से निकली, जब बलिदान कहानी हो। ।
पुलवामा में रक्त बहा हो, भारत माँ के लालो का।
और कोई हल न मिल पाया हो अनबूझ सवालों का।।
कैसे उत्सव आज मनाएं, उनके मुश्किल दीद हुए।
भारत माता के रक्षक जब, 
बस के बीच शहीद हुए ।‌।
कैसा उत्सव जब माँ के आँचल की ममता रोई थी।
कैसा प्रणय दिवस, बहनों ने अपनी माँगे खोई थीं।।
कैसा प्रेम दिवस जो केवल, नफरत लेकर आया था।
संतानों के सर से जिसने छीना पिता का साया था।।
बहन ने भाई को खोया था वृद्ध पिता लाचार हुआ।
प्रणय दिवस पत्नी का जब, लहू सना शृंगार हुआ।
प्रेम दिवस जब दुष्टों को आया नहीं था कोई तरस।
आँसू भरी हुई आँखों से,  कैसे कह दूं प्रेम दिवस।।”
        अम्बिका झा ✍️
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