बस यूँ किसी जानी पहचानी राह पर
लिए दिवा ख्वाबों की पोटली
चला जा रहा था …बढ़ा जा रहा था
कि अचानक 
एक आवाज मेरे कानों के पर्दे से टकरायी 
हवा मंद मंद मुस्कुराई 
मैंने तुरंत चारो ओर लोचनों को सैर करायी
लेकिन द्रष्टि सीमा में कोई भी सूरत 
दिमाग के डाटा बैंक से मिल न पायी 
लेकिन कानों का सेंसर सुचारू रूप से कार्यरत था 
दिमाग कानों के  पास होने के कारण पूर्ण रूप से जाग्रत था 
दिल शब्दों के संदेशों को डिकोड कर ही रहा था 
कि अचानक फिर से आवाज आयी 
अरे बेटा…. मैं हूं वट वृक्ष 
वट वृक्ष….
आवाज सुनते ही इतिहास के पन्ने फडड़ाने लगे 
आँखों के सामने से कई चलचित्र गुजर जाने लगे
वो अम्मा का पूजा करना 
कई मन्नतों के धागों  संग फेरे लेना 
और बहुत कुछ यादों के धुओं में आकृति बन रही थी 
कई दसकों से छाँव उसके क़दमों तले पड़ी थी 
मैंने झुकर उसको प्रणाम किया 
अरे ये हाल कैसे हुआ सवाल किया  ?
आपकी छालों में तो विष्णु  रहते थे 
जड़ों में ब्रह्मा तो शाखाओं में शिव दिखते थे 
आपको तो अज़र अमर होने का वरदान था 
शायद इसलिए अक्षयवट आपका ही नाम था 
आपसा विस्तृत रूप शायद ही कोई पाया हो 
शायद ही कोई ऐसा हो जो आपकी छाया न पाया हो 
फिर आचानक ये क्या हो गया 
वो लहलहाता चेहरा जाने कहाँ खो गया 
वो जिसकी सांसे लेती लटकती जडें पकड़ 
हम बचपन को पैंगें मार मार कर जवानी तक पहुंचे थे 
वो जिसकी मजबूत शाखाओं रूपी कन्धों पर चढ़ 
आसमान में तैरते बादलों को निचोड़ने का जज्बा रखते थे 
वही खाँसते खाँसते साँसों को सभालते बोला
कि कल शहर से एक बड़े बाबू आए थे 
साथ में अपने धार दार हथियार लाये थे 
कह रहे थे एस गाँव को शहर से मिलाना है
इधर से एक चौड़ी सड़क बनाना है 
मैं बूढ़ा हो रहा हूं न 
अब प्रतिरोध करने की सामर्थ्य   भी नहीं 
मैंने कहा आप और बूढ़े?
आप तो हमेशा से जवान थे 
मेरे बाबा पापा सब यही बताते थे 
वो नुक्कड़ का बरगद का  पेंड 
हमारे खेतों की मेंड 
उम्र में एक ही हैं 
फिर अचानक से आप कब से बूढ़ें हो गये
आपके विशाल मजबूत हाथ इतने कमजोर कैसे हो गये 
वो बोला , कि अब प्रेम की खाद कोई डालता ही नहीं 
अब कोई  मुझको गले लगता ही नहीं
पहले तो शाम में चौपाल लगती थी
फिर जानवरों संग मौन अंताक्षरी  की शाम सजती थी 
वही सब तो मेरे प्रोटीन विटामिन हुआ करते थे 
जो मुझको हरित और जवान रखा करते थे
पर अब शायद समय बदल गया 
मैं अब किसी काम का नहीं रहा
मैंने कहा …ऐसा तो कुछ नहीं है 
पर उसने कहा ऐसा ही अब सही है 
तभी तो किसी को मेरी कोई अब परवाह नहीं 
मेरे त्याग की भी कोई आह नहीं 
कहते कहते उसके आंसू निकलते जा रहे थे
मेरे कदम मुझे नए शहर की तरफ ले जा रहे थे
आलोक सिंह  “गुमशुदा”
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