मेरे घर के सामने
 एकबूढ़ा बरगद आज
 भी अपनी शाखाओं को 
 फैला कर वैसा ही खड़ा है
 जैसा बचपन से देखती आई
 मुझे बेहद प्यार था उससे
 न जाने कितने पक्षियों का
  बसेरा बना हुआ था
  सुबह उषा की किरणों के संग
  पक्षियों की चहचहाहट
  मन को मोह लेती थी
  जब बसन्त ऋतु का आगमन 
  होता तो कोयल की कूक
  मन्त्रमुग्ध कर जाती थी
  तपती दुपहरी में राहगीर
  व श्रमिकों को तरुछाया का
  सुकून यहीं मिलता था
  उनका विश्राम स्थल भी बन जाता
  बारिश के पानी से भी कई बार
  उनकी घनी पत्तियों और 
  मोटी शाखाएँ बचाव का कार्य करती
  बदले में उसने कभी किसी
  प्रतिदान की चाहत नहीं की
  कितनी पीढ़ियाँ देख ली उसने
  मैं तो जब मेरा दिल भर जाता
  तो उससे ही बातें कर अपना 
  दिल हल्का कर लिया करती थी
  वह खामोशी से मुझे सुनता 
  और सच कहूँ तो दिलासा भी देता
  सब्र रख सब अच्छा ही होगा….
                                     नेहा शर्मा
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