आज सुबह रश्मिरथी का लेखन-विषय विषय आया ‘बूढ़ा बरगद’। बस हो गई प्रारम्भ अंतस्तल से लेकर मस्तिष्क तक हलचल की इस बुज़ुर्गवार को आज की सतह पर किस प्रकार प्रस्तुत किया जाए अंततः आ ही गई लेकर अपने विचारों का काय कलेवर।
हरा भरा है गाँव जहाँ सड़क, चौबारे,खेत खलिहान, पगडण्डियाँ और मैदान सब ओर है वृक्षों का साम्राज्य एक जगह पर पीपल के थोड़े अंतराल पर एक बहुत ही पुराना वट वृक्ष था। जिसके तले बहुत सारे नये पुराने पौधे पनप रहे थे। उनमें कुछ उच्श्रृंखल स्वभाव के पौधे भी पनप रहे थे जिनकी सोच को नई हवा लगी हुई थी। संस्कार नाम की चीज़ न थी उनके पास। कहते हैं उस वट वृक्ष ने चार छः पीढ़ियों का प्यार दुलार और देख-रेख पा ली थी।
एक दिन उसने नयी खेप जो उसकी ही छाया में बड़े आराम से फलते फूलते ,तेज बारिश, आंधी-तूफान और झुलसती धूप की तपिश से बचते हुए पनप रहे थे को बतियाते सुना कि – यह बूढ़ा बरगद तो हमें उन्मुक्त होकर जीने भी नहीं देता,देखो न स्वयं कितना विशाल घेरा बनाए अपनी शाखाएँ और चोटियों को हम लोगों पर फैलाए रहता है।दूसरे ने कहा – अरे हमें तो ढंग से धूप और पानी भी नहीं मिलता, तीसरा बोला – हां – हां अपना तो सांस लेना भी दूभर है।एक छोटे से पौधे ने धीरे से कहा- जाने क्यों इसको अपने अतिरिक्त दूसरों की फिक्र क्यों नहीं होती?कुछ और भी बोले अरे हां, हमारे हिस्से का बहुत सारा तो यही ले लेता है बूढ़ा बरगद!
इतना सब सुन कर वह वट वृक्ष बोला – बहुत रह लिया इस धरा पर, अब मुझे जाना होगा।समय हो रहा मेरा तो,अब मुझे चलना होगा। सुन कर हुआ उदास वो पीपल- सुख दुःख के साथी थे हम तुम, इस साम्राज्य के सेवक थे। कैसे तुम बिन जिऊँगा मैं कुछ हमें भी तो समझाना होगा।
फिर बोला बरगद – अभी तुम्हारा वक्त नहीं, आस धरो भाई मेरे! बीचे से प्रतिरूप मेरा इक आएगा। तबतक इन्हें भी समझ आएगा कि कौन किसके हिस्से की धूप, हवा पानी और स्थान घेर कर बैठा है।
थोड़े समयांतराल में वह वट वृक्ष धीरे धीरे सूखते हुए अपने अंत को पहुँच गया। तत्पश्चात सीधी हवा धूप, आंधी-तूफान, और ओले के मार नई खेप को अपने चपेट में लेने लगी।कोई मुरझा रहा था,तो कोई गंजा हो रहा था। वहीं कोई टूट कर गिर रहा था,तब उन्हें समझ आया कि हम जिसकी बुराइयाँ करते नहीं थकते थे वही बूढ़ा बरगद ही हमारा जीवन रक्षक था। उन सबके दुःख दर्द और पश्चाताप को देखकर बगल में खड़ा पीपल के पेड़ ने कहा- अब तो फिर से वक्त का इंतज़ार करो नया वट वृक्ष अंकुरित हो रहा है वही तुम्हारी समस्या का हल बनेगा।
यही हाल तो समाज का भी देखने को मिलता है।जो है वह असहनीय है और जो चला जाता है उसकी कीमत पता चलती है वही मूल्यवान हो जाता है।
लेखिका
सुषमा श्रीवास्तव
