बिन्दु का सिन्धु से मिलना तय ही तो है।
क्यों न प्यासों की प्यास बुझाता चले।।
रूखे चेहरों को चाहत है इक बूंद की।
क्यों न उनकी वो रौनक बढा़ता चले।।
दौड़कर आयेगा सिन्धु उसके निकट।
काम अपना अगर वो करता चले।।
लौट कर आना है इस धरा पर उसे।
क्यों न उसका वो दामन भिगोता चले।।
जीवन है बिन्दु सम ईश्वर ही सिन्थु है।
नाम उसका निशदिन जपता चले।।
आशा की आस है बिन्दु सबको मिले।
यात्रा पूरी हो सब सिन्धु तक ही चलें
स्वरचित मौलिक अप्रकाशित सर्वाधिकार सुरक्षित डॉक्टर आशा श्रीवास्तव जबलपुर
