बाबुल तो महज एक होता मेजबान।
बेटी जहां की होती महज एक मेहमान।
एक ऐसी मेहमान जो हिचक के संग नहीं रहती।
अल्हड़ता लिए किसी नदी की तरह बहती।
बाबुल का लंबे समय तक इस मेहमान से जी न भरता।
विदा होने में यदि देरी हो जाए तो चिंता से आहें भरता।
बहुत दुविधासिंचित होता बाबुल बेटी का रिश्ता।
सबसे अनोखा होता जग में बाबुल बेटी का रिश्ता।
बाबुल के दर से अथाह स्नेह है,पर सपनें भी है आंखों में।
प्रियवर सतरंगी नगर ले जाए बांधे मीठे सलाखों में।
अश्रुमय नेत्रों संग अनजान देश भेजने को बेताब।
यहां के कण-कण में बसी फिर भी पीछा करता एक खाब।
भारी मन से विदा कर खुद को जैसे तैसै बहलाते।
वो परदेश जा संवारती सब,खुद को कभी खिलते-कुम्हलाते।
रब करे बाबुल के घर से निकली अल्हड़ बुलबुल।
खुशियां ढ़ेरों पाए और सबको दे सबसे मिलघुल।
-चेतना सिंह,पूर्वी चंपारण।
