इंतजार तेरा तेरे आने तक है,
बस ये लडाई पाने तक है।
रोटी की कीमत ही क्या है
पेट तेरा भर जाने तक है।
मिलते ही सब खत्म यहां पर,
बात तेरे समझ आने तक है।
माना मिलती है यहां मंजिल,
मजा राह गुजर जाने तक है।
आंनद अधूरे पन में जो है
कंहा वो पूरा हो जाने पर है।
दौड शराबी की है कंहा तक
नुक्कड के मयखाने तक है।
अपने भी अपने नहीं होते,
इज्जत तेरी कमाने तक है।
मन जिद्दी बच्चा मांगे खिलौना,
कुछ देर ही वो बहलाने तक है।
फल बिन ईच्छा कर्म किए जा,
निष्कर्म ही प्रभु घराने तक है।
पथिक पूर्ण होना ही अंत है,
बात ये सकल जमाने तक है।।
पथिक पंडित द्वारा रचित
