वो जो नाम जोड़ता था साथ हमारे,
हमारा नाम ज़हन से मिटाने लगा,
हम जब से बढ़ने लगे उसकी जानिब,
कदम अपने वो पीछे हटाने लगा!
हम बढे ही थे अपना उसकी ओर
अपना हाल-ए-दिल बताने,
हमने कुछ कहा भी नहीं था और
वो हद हमें हमारी ही दिखाने लगा!
वो कहता रहा ज़िंदगी हमें,
हम झूमकर हर खुशी उसपर लुटाते रहे
सांसों में भरी जो खुशबू उसकी हमने,
वो ज़िंदगी के मायने समझाने लगा।
तोड़ता रहा हर बंदिशें सारी
हमें करीब अपने बुलाता रहा,
छूट गए हम जब हर बंधन से,
कदम पीछे हटा,
वो दस्तूर ज़माने का बतलाने लगा।
जो कहता था सदा
असूल नहीं होते मुहब्बत में,
कि आ मिल जाएँ हम एक हो जाएँ!
यकीन किया इसपर, मिटा कर वजूद अपना
सोचा ही था कि मिल जाएँ उसमें, कि-
वो रस्मों-रिवाज़ दुनिया के सिखाने लगा।
हम जो उलझे से जाते थे बातों में उसकी,
उसकी आंखों के भंवर में डूबे जाते थे,
फेर ली नज़रें हमसे उसने,
हो कर मौन वो,हर उलझन हमारी सुलझाने लगा!.
कहा था रंग धनक के नज़र आते हैं हमें मुहब्बत के उसकी असमानी आंखों में,
फेर कर आंखे इस कदर बदला वो
हमें बदले से रंग दुनिया के दिखलाने लगा!
बना कर उसको खुदा अपना हम
उसकी मुहब्बत को रहमत मानते रहे रब की,
वो खुदा-खुदा कर तौबा किया,
नाम-ए-इश्क बेमानी सा बताने लगा!
स्वरचित- शालिनी अग्रवाल
जलंधर
