जिस दिन बाबा को गांव बालों ने सुजान को भड़काने के लिये पीटा था, उसी दिन से बाबा दर्द के कारण तड़प रहा था। वैसे उसे जंगली औषधियों का ज्ञान था। फिर भी उसका ज्ञान सार्थक नहीं हो पाया। बुढापे के अतिरिक्त चोटिल शरीर भी उसके उद्देश्य को असफल बना रहा था। दिन पर दिन गुजरते गये। दवा तो दूर अपितु भोजन के भी अभाव में अब उसके प्राण ही विदा होने को तैयार थे। फिर भी न जाने कौन सी इच्छा शक्ति उसे जिंदा रखे हुए थी।
होली के एक दिन पूर्व से ही उसे तेज बुखार आ गया। बुखार में अक्सर मनुष्य चेतनाशून्य हो जाता है। कभी कभी वह ऐसी ऐसी बातें भी बड़बड़ाता है जिसका वास्तविक जीवन में कोई अर्थ नहीं होता। ऐसे ऐसे दृश्य देखने लगता है जिन्हें मैडिकल विज्ञान मात्र रोगी के अवचेतन मन की कल्पना कहता है।
बाबा की भी रात से कुछ ऐसी ही स्थिति थी। वह देख रहा था एक अलोकिक विमान। स्वर्ण वर्ण विमान पर स्वर्ण वर्ण के चार हंस जुते हुए। उसका तेज ऐसा कि आंखें चुधियां जायें।वह दिव्य विमान अंतरिक्ष से उतरा और दो देवदूत हाथ जोड़कर विमान से उतर उसी मढैया की तरफ आते हुए।
” अभी रुकिये। कुछ प्रतीक्षा करनी है। अभी नहीं चल सकता।”
बाबा खुद व खुद बड़बड़ाना रहा था। देवदूत भी हाथ जोड़ उसकी सहमति की प्रतीक्षा कर रहे थे।
बाबा फिर अधीर हो रहा था। संभावित अंतिम समय में भी आस रखे था कि उसकी प्रेमिका रज्जो उसके प्रेम को समझ ले। समझ ले कि उसने उसे सच्चा प्रेम ही किया था। जब भी उसने किसी प्रेम कहानी को पूर्णता दिलायी तब उसे यही तो अनुभव हुआ कि उसका प्रेम ही पूर्णता को प्राप्त हुआ।
रात गुजर गयी। भगवान भाष्कर नभ मंडल पर आ गये। दोपहर का समय आ गया। पर बाबा का इंतजार पूर्ण न हुआ। दूसरी तरफ देवदूतों का प्रतीक्षा काल भी बढता गया।
अचानक दूर से रज्जो आती दिखाई दी। बाबा चाहकर भी उठ न पाया। कभी रज्जो को एक नजर देखने के लिये बाबरे की तरफ भागने बाला कन्हैया अपनी दीनता पर रोने लगा।
” कन्हैया। तुम सच ही कहते थे। सत्य तो यही है कि हमारा प्रेम सत्य था। जीवन के इतने वर्ष गुजर जाने के बाद भी आज भी तुम मेरी यादों में दस्तक देते हों। आज एक अधूरी प्रेम कहानी को पूर्णता तक पहुंचाकर मुझे भी लग रहा है कि मानों हमारा प्रेम ही पूर्ण हुआ है।”
इसके आगे रज्जो कुछ बोल न सकी। रज्जो और कन्हैया दोनों के आंखों से आंसुओं की बाढ आ गयी। और फिर…. । कन्हैया एकदम शांत हो गया। आजीवन प्रेम का पुजारी अनंत यात्रा पर निकल गया।
कुछ दिनों बाद उसी मढैया के स्थान पर ढोंगी बाबा की समाधि थी। बहुत वर्षों तक रज्जो उस समाधि की नित्य पूजा करती रही। न जाने यह विश्वास किस तरह प्रचलित हो गया कि ढोंगी बाबा की आराधना से अधूरी प्रेम गाथाएं भी पूर्ण हो जाती हैं। फिर अक्सर कोई न कोई प्रेम का साधक उस बाबा से अपने प्रेम की सफलता का वरदान मांगता दिखाई दे जाता। हर वर्ष फागुन के महीने में एक मेला लगने लगा। जिसकी प्रेम कहानी खुद अपूर्ण रही, उसके आशीर्वाद से कितनों की प्रेम कहानियाँ पूर्ण हुईं, उनकी गणना किसी के वश में नहीं है।
समाप्त
दिवा शंकर सारस्वत ‘प्रशांत’
विशेष – यह एक पूर्ण काल्पनिक कहानी है। यदि किसी व्यक्ति, या स्थान से इसका कोई संबंध मिलता है तो उसे महज एक संयोग समझना चाहिये।
