आधी से अधिक रात गुजर गयी। पूरा गांव गहरी नींद में सो रहा था। आज दिन में जो स्थिति आ गयी, उसके बाद युवाओं का मन भी कुछ व्यथित था। सत्य बात तो यही है कि युवाओं का चिंतन अपेक्षाकृत अधिक विस्तृत होता है। आखिर सुजान उनका मित्र था। फिर उत्साह हीन हुरदंगी युवा समाज भी आज रात्रि शांत था। कुछ समय पूर्व तक गांव के कुत्ते भोंक रहे थे। फिर संभवतः वे भी गहरी नींद में सो गये। शांति में झींगुरों का शव्द भी स्पष्ट सुनाई दे रहा था।
  इस रात्रि में जबकि पूरा गांव गहरी नींद में सो रहा था, गांव में तीन ऐसे थे जिनसे आज निद्रा देवी ने दूरी बना ली थी। सुजान प्रेम का वह पुजारी, जिसने आज ही अपनी पूरी इच्छाशक्ति से प्रेम यज्ञ में अपनी आहुति दी थी, नींद से कोसों दूर था। सुंदरिया के मन की अपने अनुसार विवेचना कर रहा था। बाबा का कथन उसे सत्य लग रहा था। स्त्रियाँ अक्सर अपने मन के प्रेम को छिपाती हैं। अक्सर खुद अपने मन को भी धोखा देती हैं। सचमुच सुंदरिया की आंखों में किसी तरह की कोई अस्वीकृति तो नहीं थी। सुंदरिया उसके प्रस्ताव पर उसे फटकार सकती थी। पूरी बात सुनने से पूर्व भी बोल सकती थी। सुना है कि रज्जो ताई ने उसे बहुत पीटा भी है। फिर भी उसका मेरे विपक्ष में कुछ भी न बोलना, यही तो सिद्ध कर रहा है कि वास्तव में प्रेम ने उसके मन को भी वश में कर लिया है।
   दूसरी तरफ सुंदरिया को भी नींद नहीं आ रही है। वह खुद अपने मन से प्रश्न कर रही थी। उसने सुजान की पूरी बात सुनी ही क्यों। क्या उसका मन भी सुजान के लिये डांवाडोल है। लगता तो यही है। फिर भी सत्य स्वीकार नहीं करना चाहिये। एक स्त्री को अपने मन का करने का क्या अधिकार। फिर मन की बात सुनने का क्या प्रश्न।
   गांव से बाहर मढैया में बाबा दर्द से कराह रहा था। ऐसे दर्द में भला कैसे सो पाता। उसके कराहने की ध्वनि से वह निर्जन स्थल गूंज रहा था। संभव है कि उसका मानस बाह्य रूप से भी अधिक जोर से कराह रहा हो। शरीर की तुलना में मन का दर्द ज्यादा असह्य होता है। फिर जब शरीर में भी दर्द हो तब मानस जीवन के कितने ही दर्दों का एक साथ अनुभव करने लगता है। पूरे जीवन के मानसिक दर्द जब एक साथ उठने लगते हैं, उस समय शरीर की पीड़ा कुछ भी नहीं लगती।
  इन सभी के जगते रहने का कारण था। सभी अपने अपने दर्द से गुजर रहे थे। पर रज्जो के जगते रहने का क्या कारण हो सकता है। आज तो उसने बहू की जमकर धुनाई भी की है। इससे तो उसके मन को अलग शांति ही मिलनी चाहिये। पर रज्जो की यह अशांति क्यों। क्या यह पश्चाताप की अग्नि थी। क्या उसका मन अपने पुराने मत को झुठला रहा था। क्या उसे सुंदरिया पर दया आ रही थी। अथवा क्या वह रहस्य उससे भी अधिक रहस्यमई था जितना कि कोई अनुमान लगा सकता है।
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत ‘प्रशांत’
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